भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 4, श्लोक 1–10 | ज्ञानकर्मसंन्यासयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 4, श्लोक 1–10 | ज्ञानकर्मसंन्यासयोग | अर्थ सहित

तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का विस्तार से उपदेश दिया — कि बिना फल की आसक्ति के अपना कर्तव्य करना ही श्रेष्ठ मार्ग है। चौथे अध्याय के आरंभ में श्रीकृष्ण इस ज्ञान की प्राचीन परंपरा बताते हैं और फिर अपने दिव्य जन्म एवं अवतार के रहस्य को प्रकट करते हैं। इस खंड में अर्जुन की जिज्ञासा और श्रीकृष्ण के उत्तर के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर का प्रकट होना, उनके जन्म और कर्म — सब दिव्य हैं।

श्लोक 4.1

वक्ता: श्रीकृष्ण

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥4.1॥

śhrī bhagavān uvācha / imaṁ vivasvate yogaṁ proktavān aham avyayam / vivasvān manave prāha manur ikṣhvākave ’bravīt

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य (विवस्वान्) से कहा था। सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा, और मनु ने राजा इक्ष्वाकु से कहा।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि यह कर्मयोग कोई नई बात नहीं है — इसकी एक सुदीर्घ परंपरा है। 'अव्ययम्' का अर्थ है अविनाशी अर्थात् जो कभी नष्ट नहीं होता। यह ज्ञान सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान् को दिया गया, फिर उनके पुत्र मनु को, और मनु से राजा इक्ष्वाकु तक पहुँचा। इस प्रकार यह योग सृष्टि के आरंभ से ही मानव जाति के कल्याण के लिए प्रवाहित होता रहा है।

आज के जीवन में: जो ज्ञान परंपरा से सिद्ध हो, उसे श्रद्धा और विश्वास के साथ ग्रहण करना चाहिए।


श्लोक 4.2

वक्ता: श्रीकृष्ण

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥4.2॥

evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣhayo viduḥ / sa kāleneha mahatā yogo naṣhṭaḥ parantapa

हिंदी अनुवाद: हे परंतप! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियों ने जाना। किंतु बहुत काल बीत जाने के कारण यह योग इस मनुष्यलोक में लुप्तप्राय हो गया।

भावार्थ: श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि यह ज्ञान केवल विद्वानों तक सीमित नहीं था — 'राजर्षि' अर्थात् राजा होते हुए भी ऋषि-तुल्य जो महापुरुष थे, उन्होंने इसे जाना और जीया। 'परन्तप' अर्जुन का विशेषण है जिसका अर्थ है शत्रुओं को तपाने वाला। समय के साथ यह परंपरा टूट गई और यह श्रेष्ठ ज्ञान लोगों की स्मृति से ओझल हो गया। इसीलिए इसे पुनः कहने की आवश्यकता पड़ी।

आज के जीवन में: श्रेष्ठ ज्ञान को जीवित रखने के लिए उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सँजोना और आचरण में उतारना आवश्यक है।


श्लोक 4.3

वक्ता: श्रीकृष्ण

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥4.3॥

sa evāyaṁ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ / bhakto ’si me sakhā cheti rahasyaṁ hyetad uttamam

हिंदी अनुवाद: वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है, क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है — यह बड़ा उत्तम रहस्य है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यह ज्ञान अर्जुन को क्यों दिया जा रहा है — दो कारण हैं: भक्ति और मित्रता। 'रहस्यम्' शब्द बताता है कि यह ज्ञान गूढ़ और अत्यंत मूल्यवान है, इसे हर किसी को नहीं दिया जाता। 'पुरातनः' अर्थात् यह योग अत्यंत प्राचीन है, नया नहीं। श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रति अपने प्रेम और विश्वास को इस ज्ञान-दान का आधार बताते हैं।

आज के जीवन में: गहरा ज्ञान उसी को फलता है जिसमें श्रद्धा और विश्वास दोनों हों।


श्लोक 4.4

वक्ता: अर्जुन

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥4.4॥

arjuna uvācha / aparaṁ bhavato janma paraṁ janma vivasvataḥ / katham etad vijānīyāṁ tvam ādau proktavān iti

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — आपका जन्म तो अभी का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है; तो यह कैसे मानूँ कि आपने ही सृष्टि के आदि में सूर्य को यह योग कहा था?

भावार्थ: अर्जुन की यह जिज्ञासा स्वाभाविक और तर्कसंगत है। वे श्रीकृष्ण को अपने सखा और समकालीन के रूप में जानते हैं। सूर्य तो सृष्टि के आरंभ से हैं, जबकि श्रीकृष्ण का जन्म अभी हुआ है — यह विरोधाभास उन्हें उलझन में डालता है। 'अपरम्' का अर्थ है बाद का या अर्वाचीन, और 'परम्' का अर्थ है पहले का। अर्जुन का यह प्रश्न ही आगे के दिव्य उत्तर का द्वार खोलता है।

आज के जीवन में: सच्ची जिज्ञासा और निर्भीक प्रश्न ही गहरे ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करते हैं।


श्लोक 4.5

वक्ता: श्रीकृष्ण

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥4.5॥

śhrī bhagavān uvācha / bahūni me vyatītāni janmāni tava chārjuna / tānyahaṁ veda sarvāṇi na tvaṁ vettha parantapa

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे अनेक जन्म बीत चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, परंतु तू नहीं जानता।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए एक महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट करते हैं — दोनों के अनेक जन्म हुए हैं, किंतु अंतर यह है कि श्रीकृष्ण उन सबको जानते हैं और अर्जुन नहीं। यह ईश्वर और जीव के बीच का मूल अंतर है। ईश्वर की चेतना कालातीत और सर्वज्ञ है, जबकि जीव की चेतना शरीर और काल से बँधी है। यह श्लोक अगले श्लोकों में दिव्य जन्म के रहस्य की भूमिका बनाता है।

आज के जीवन में: ईश्वर की चेतना असीम और कालातीत है — यह समझ विनम्रता और श्रद्धा जगाती है।


श्लोक 4.6

वक्ता: श्रीकृष्ण

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥4.6॥

ajo ’pi sannavyayātmā bhūtānām īśhvaro ’pi san / prakṛitiṁ svām adhiṣhṭhāya sambhavāmyātma-māyayā

हिंदी अनुवाद: मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी, और समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी, अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।

भावार्थ: यह श्लोक ईश्वर के अवतरण का मूल रहस्य बताता है। 'अजः' अर्थात् जिसका जन्म नहीं होता, 'अव्ययात्मा' अर्थात् जिसका स्वरूप कभी नष्ट नहीं होता — ऐसे होते हुए भी श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं। यह प्रकटन किसी बाहरी कारण से नहीं, बल्कि अपनी 'आत्ममाया' अर्थात् अपनी स्वयं की शक्ति से होता है। वे प्रकृति के अधीन नहीं, बल्कि प्रकृति उनके अधीन है — यही साधारण जन्म और दिव्य अवतरण का अंतर है।

आज के जीवन में: ईश्वर का प्रकट होना उनकी स्वतंत्र इच्छा और करुणा से होता है, किसी बंधन से नहीं।


श्लोक 4.7

वक्ता: श्रीकृष्ण

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥4.7॥

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata / abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛijāmyaham

हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को साकार रूप में प्रकट करता हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अवतार के कारण को स्पष्ट करते हैं। 'ग्लानिः' का अर्थ है क्षीणता या हानि, और 'अभ्युत्थानम्' का अर्थ है उठान या वृद्धि। जब समाज में धर्म — अर्थात् उचित आचरण, न्याय और सत्य — कमज़ोर पड़ने लगता है और अधर्म सिर उठाता है, तब ईश्वर स्वयं प्रकट होते हैं। यह ईश्वर की सृष्टि के प्रति सतत जागरूकता और करुणा का प्रमाण है।

आज के जीवन में: जब भी जीवन में अनुचित बढ़ने लगे, तब यह विश्वास बनाए रखें कि सत्य और धर्म की पुनर्स्थापना होती है।


श्लोक 4.8

वक्ता: श्रीकृष्ण

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥4.8॥

paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśhāya cha duṣhkṛitām / dharma-sansthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge

हिंदी अनुवाद: सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्कर्मियों के विनाश के लिए, और धर्म की भली-भाँति स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

भावार्थ: यह श्लोक अवतार के तीन प्रयोजन बताता है — 'साधूनां परित्राणाय' अर्थात् भले लोगों की रक्षा, 'दुष्कृताम् विनाशाय' अर्थात् दुष्कर्म करने वालों का अंत, और 'धर्मसंस्थापनार्थाय' अर्थात् धर्म की पुनः स्थापना। 'युगे युगे' का अर्थ है हर युग में — यह एक बार की घटना नहीं, बल्कि ईश्वर की सृष्टि के प्रति शाश्वत प्रतिबद्धता है।

आज के जीवन में: ईश्वर की यह प्रतिबद्धता हमें भी प्रेरित करती है कि हम अपने जीवन में सज्जनता की रक्षा और धर्म की स्थापना में सहयोग दें।


श्लोक 4.9

वक्ता: श्रीकृष्ण

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥4.9॥

janma karma cha me divyam evaṁ yo vetti tattvataḥ / tyaktvā dehaṁ punar janma naiti mām eti so ’rjuna

हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। जो मनुष्य इन्हें तत्त्व से — अर्थात् सच्चे रूप में — जान लेता है, वह शरीर छोड़ने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे प्राप्त होता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं — उनके जन्म और कर्म 'दिव्य' हैं, अर्थात् साधारण मनुष्य के जन्म और कर्म जैसे नहीं। 'तत्त्वतः' का अर्थ है सच्चाई से, गहराई से जानना — केवल बौद्धिक जानकारी नहीं, बल्कि दृढ़ अनुभव। जो इस सत्य को हृदय से जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान ही मोक्ष का द्वार है।

आज के जीवन में: ईश्वर के स्वरूप को सच्चे मन से जानने और मानने का प्रयास ही जीवन को ऊँचाई देता है।


श्लोक 4.10

वक्ता: श्रीकृष्ण

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥4.10॥

vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśhritāḥ / bahavo jñāna-tapasā pūtā mad-bhāvam āgatāḥ

हिंदी अनुवाद: राग, भय और क्रोध से पूर्णतः मुक्त, मुझमें ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित और ज्ञानरूपी तप से पवित्र हुए अनेक भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह मार्ग केवल सैद्धांतिक नहीं है — अनेक लोग इस पर चलकर सिद्धि पा चुके हैं। 'वीतराग' अर्थात् आसक्ति से मुक्त, 'वीतभय' अर्थात् भय से रहित, 'वीतक्रोध' अर्थात् क्रोध से परे — ये तीन गुण साधक की पहचान हैं। 'ज्ञानतपसा पूताः' अर्थात् ज्ञान के तप से शुद्ध हुए — यहाँ ज्ञान को तप कहा गया है, जो मन को परिष्कृत करता है। ऐसे साधक ईश्वर के भाव को प्राप्त होते हैं।

आज के जीवन में: राग, भय और क्रोध को कम करते हुए ज्ञान के प्रकाश में जीना ही सच्ची साधना है।


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