भगवद्गीता अध्याय 4, श्लोक 11–20 | ज्ञानकर्मसंन्यासयोग | अर्थ सहित
अध्याय चार के पहले भाग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि वे बार-बार जन्म लेते हैं और धर्म की रक्षा के लिए अवतार धारण करते हैं। अब इस खंड में वे यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर सभी मार्गों से आने वाले भक्तों को स्वीकार करते हैं, चातुर्वर्ण्य की रचना का रहस्य क्या है, और कर्म, अकर्म तथा विकर्म का गहरा भेद क्या है।
श्लोक 4.11
वक्ता: श्रीकृष्ण
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥4.11॥
ye yathā māṁ prapadyante tāns tathaiva bhajāmyaham / mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ
हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि ईश्वर किसी एक पथ के बंधक नहीं हैं। जो जिस भाव, श्रद्धा और मार्ग से उनके पास आता है — ज्ञान से, भक्ति से, कर्म से — वे उसे उसी रूप में स्वीकार करते हैं। 'प्रपद्यन्ते' का अर्थ है शरण लेना और 'भजामि' का अर्थ है आश्रय देना या पुरस्कृत करना। सभी मनुष्य अंततः उन्हीं के मार्ग पर चलते हैं, चाहे उन्हें इसका बोध हो या न हो — क्योंकि सारी सृष्टि उन्हीं से है।
आज के जीवन में: जो जिस सच्चे भाव से परमात्मा की ओर बढ़ता है, उसे उसी भाव से प्रतिफल मिलता है — इसलिए अपनी साधना में ईमानदारी सबसे बड़ी शक्ति है।
श्लोक 4.12
वक्ता: श्रीकृष्ण
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥4.12॥
kāṅkṣhantaḥ karmaṇāṁ siddhiṁ yajanta iha devatāḥ / kṣhipraṁ hi mānuṣhe loke siddhir bhavati karmajā
हिंदी अनुवाद: कर्मों का फल शीघ्र पाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य इस लोक में देवताओं की उपासना करते हैं; क्योंकि इस मनुष्य-लोक में कर्मों से उत्पन्न सिद्धि जल्दी प्राप्त होती है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक व्यावहारिक सत्य बता रहे हैं। जो लोग सांसारिक सफलता — धन, यश, स्वास्थ्य आदि — की कामना रखते हैं, वे देवताओं की उपासना करते हैं और उन्हें शीघ्र फल भी मिलता है। 'कर्मजा सिद्धि' अर्थात कर्म से उत्पन्न होने वाला फल इस लोक में तेज़ी से मिलता है। यह श्लोक न तो देवोपासना की निंदा करता है, न प्रशंसा — केवल यह स्पष्ट करता है कि ऐसे फल सीमित और सांसारिक होते हैं।
आज के जीवन में: सांसारिक फल की चाह से की गई उपासना शीघ्र फल देती है, किंतु वह फल उतना ही सीमित होता है — इसलिए लक्ष्य की ऊँचाई भी महत्त्वपूर्ण है।
श्लोक 4.13
वक्ता: श्रीकृष्ण
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥4.13॥
chātur-varṇyaṁ mayā sṛiṣhṭaṁ guṇa-karma-vibhāgaśhaḥ / tasya kartāram api māṁ viddhyakartāram avyayam
हिंदी अनुवाद: गुणों और कर्मों के विभाग के अनुसार चारों वर्णों की रचना मेरे द्वारा की गई है; उस रचना का कर्ता होने पर भी मुझ अव्यय परमेश्वर को तू अकर्ता जान।
भावार्थ: श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि चातुर्वर्ण्य — समाज की चार श्रेणियाँ — उन्होंने 'गुण' (प्रकृति के तीन गुण) और 'कर्म' (स्वभाव व कार्य) के आधार पर बनाई हैं। यह जन्म पर नहीं, गुण और कर्म पर आधारित है। 'अव्यय' का अर्थ है जो कभी क्षीण न हो। वे इस सृष्टि के रचयिता होते हुए भी उससे लिप्त नहीं हैं — वे अकर्ता हैं, क्योंकि उनका कोई स्वार्थ नहीं, कोई फल-कामना नहीं।
आज के जीवन में: कार्य करते हुए भी यदि भीतर से कोई आसक्ति या स्वार्थ न हो, तो मनुष्य कर्ता होते हुए भी वास्तव में अकर्ता बन सकता है।
श्लोक 4.14
वक्ता: श्रीकृष्ण
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥4.14॥
na māṁ karmāṇi limpanti na me karma-phale spṛihā / iti māṁ yo ’bhijānāti karmabhir na sa badhyate
हिंदी अनुवाद: कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और कर्मों के फल में मेरी कोई स्पृहा नहीं है; जो मुझे इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।
भावार्थ: यह श्लोक पिछले श्लोक का सार है। 'स्पृहा' का अर्थ है लालसा या चाहत। श्रीकृष्ण कहते हैं कि चूँकि उन्हें फल की कोई चाह नहीं, इसलिए कर्म उन्हें बाँध नहीं सकते। और जो साधक इस सत्य को भीतर से समझ लेता है — कि ईश्वर निर्लिप्त हैं — वह भी उसी भाव से कर्म करने लगता है और बंधन से मुक्त हो जाता है। ज्ञान ही यहाँ मुक्ति का साधन है।
आज के जीवन में: फल की चाह छोड़कर कर्म करने वाला न केवल शांत रहता है, बल्कि कर्म के बंधन से भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 4.15
वक्ता: श्रीकृष्ण
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥4.15॥
evaṁ jñātvā kṛitaṁ karma pūrvair api mumukṣhubhiḥ / kuru karmaiva tasmāttvaṁ pūrvaiḥ pūrvataraṁ kṛitam
हिंदी अनुवाद: पूर्वकाल के मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर कर्म किए हैं; इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रेरित करते हैं कि यह ज्ञान नया नहीं है। 'मुमुक्षु' अर्थात मोक्ष की कामना रखने वाले — प्राचीन साधकों ने भी इसी निर्लिप्त भाव को जानकर कर्म किए और मुक्त हुए। परंपरा का यह उल्लेख अर्जुन को यह विश्वास दिलाने के लिए है कि कर्म और ज्ञान में कोई विरोध नहीं — दोनों साथ चल सकते हैं। अतः कर्म से विमुख होने की कोई आवश्यकता नहीं।
आज के जीवन में: जब हम देखते हैं कि महान पूर्वजों ने भी इसी मार्ग पर चलकर जीवन सार्थक किया, तो हमें अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होना चाहिए।
श्लोक 4.16
वक्ता: श्रीकृष्ण
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥4.16॥
kiṁ karma kim akarmeti kavayo ’pyatra mohitāḥ / tat te karma pravakṣhyāmi yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt
हिंदी अनुवाद: कर्म क्या है और अकर्म क्या है — इस विषय में विद्वान भी मोहित हो जाते हैं; इसलिए मैं तुम्हें कर्म का वह तत्त्व भलीभाँति बताऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ बंधन से मुक्त हो जाओगे।
भावार्थ: श्रीकृष्ण स्वीकार करते हैं कि कर्म और अकर्म का भेद इतना सूक्ष्म है कि 'कवि' अर्थात विद्वान और बुद्धिमान लोग भी इसमें भ्रमित हो जाते हैं। यह भ्रम साधारण नहीं है — इसीलिए वे स्वयं इसे विस्तार से समझाने का संकल्प लेते हैं। 'अशुभ' से यहाँ संसार-बंधन अभिप्रेत है। यह श्लोक आगे आने वाले गहन विवेचन की भूमिका है।
आज के जीवन में: जो विषय गहरा हो, उसे समझने के लिए सच्चे जिज्ञासु भाव से किसी ज्ञानी की बात सुनना आवश्यक है।
श्लोक 4.17
वक्ता: श्रीकृष्ण
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥4.17॥
karmaṇo hyapi boddhavyaṁ boddhavyaṁ cha vikarmaṇaḥ / akarmaṇaśh cha boddhavyaṁ gahanā karmaṇo gatiḥ
हिंदी अनुवाद: कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए, विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए, और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति अत्यंत गहन है।
भावार्थ: यहाँ तीन शब्द महत्त्वपूर्ण हैं — 'कर्म' अर्थात शास्त्र-विहित उचित कार्य, 'विकर्म' अर्थात निषिद्ध या अनुचित कार्य, और 'अकर्म' अर्थात कर्म न करना या निर्लिप्त भाव से किया गया कर्म। श्रीकृष्ण कहते हैं कि तीनों को ठीक से समझना आवश्यक है, क्योंकि 'कर्मणो गतिः गहना' — कर्म की गति बहुत गहरी और जटिल है। ऊपर से जो कर्म दिखता है, वह भीतर से अकर्म हो सकता है और इसके विपरीत भी।
आज के जीवन में: केवल बाहरी क्रिया से कर्म की सच्चाई नहीं जानी जा सकती — उसके पीछे का भाव और उद्देश्य भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
श्लोक 4.18
वक्ता: श्रीकृष्ण
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥4.18॥
karmaṇyakarma yaḥ paśhyed akarmaṇi cha karma yaḥ / sa buddhimān manuṣhyeṣhu sa yuktaḥ kṛitsna-karma-kṛit
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वह योगी है और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।
भावार्थ: यह श्लोक गीता के सबसे गहरे सूत्रों में से एक है। 'कर्म में अकर्म देखना' — अर्थात सक्रिय रहते हुए भी भीतर से निर्लिप्त रहना, कर्ता-भाव न रखना। 'अकर्म में कर्म देखना' — अर्थात जो बाहर से निष्क्रिय दिखता है, उसके भीतर भी अहंकार और वासना की क्रिया हो सकती है। जो इस सूक्ष्म भेद को समझता है, वही सच्चा 'युक्त' अर्थात योगी है और वही 'कृत्स्नकर्मकृत्' — सम्पूर्ण कर्मों का करने वाला है।
आज के जीवन में: सच्चा कर्मयोगी वह है जो काम करते हुए भी भीतर से शांत और अनासक्त रहता है — बाहरी व्यस्तता और भीतरी स्थिरता साथ-साथ चल सकती है।
श्लोक 4.19
वक्ता: श्रीकृष्ण
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥4.19॥
yasya sarve samārambhāḥ kāma-saṅkalpa-varjitāḥ / jñānāgni-dagdha-karmāṇaṁ tam āhuḥ paṇḍitaṁ budhāḥ
हिंदी अनुवाद: जिसके सभी कार्यों के आरंभ कामना और संकल्प से रहित हैं, और जिसके सभी कर्म ज्ञान की अग्नि में जल गए हैं, उसे ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं।
भावार्थ: यहाँ सच्चे पंडित की पहचान बताई गई है। 'कामसंकल्पवर्जित' — जिसके कर्मों में इच्छा और योजना का बीज नहीं है। 'ज्ञानाग्नि' — ज्ञान की अग्नि, जो कर्मों के संचित प्रभाव को जला देती है। जब कर्म बिना अहंकार और फल-कामना के किए जाते हैं, तो वे बंधन नहीं बनते। ऐसे व्यक्ति को स्वयं ज्ञानी लोग भी 'पंडित' — वास्तविक विद्वान — मानते हैं।
आज के जीवन में: जब कोई कार्य बिना किसी स्वार्थ या फल की चाह के किया जाए, तो वह कर्म बंधन नहीं बनता — यही ज्ञान की सच्ची परिपक्वता है।
श्लोक 4.20
वक्ता: श्रीकृष्ण
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥4.20॥
tyaktvā karma-phalāsaṅgaṁ nitya-tṛipto nirāśhrayaḥ / karmaṇyabhipravṛitto ’pi naiva kiñchit karoti saḥ
हिंदी अनुवाद: जो कर्म और फल की आसक्ति को त्यागकर, किसी आश्रय के बिना, सदा तृप्त रहता है, वह कर्मों में पूरी तरह लगा होने पर भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।
भावार्थ: 'नित्यतृप्त' — जो सदा संतुष्ट है, जिसे बाहरी परिस्थितियों से तृप्ति की आवश्यकता नहीं। 'निराश्रय' — जो किसी फल या सहारे पर निर्भर नहीं। ऐसा व्यक्ति कर्म करता है, पर कर्ता नहीं बनता — क्योंकि उसका 'मैंने किया' का भाव नहीं है। यह अकर्ता-भाव ही मुक्ति का लक्षण है। यह श्लोक पिछले श्लोकों में बताए गए ज्ञानी पुरुष के जीवन का व्यावहारिक चित्र प्रस्तुत करता है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति फल की चाह और आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, वह सक्रिय रहते हुए भी भीतर से स्वतंत्र और शांत रहता है।
आगे पढ़िए
← पिछला भाग: अध्याय 4, श्लोक 1–10
अगला भाग: अध्याय 4, श्लोक 21–30 →
मन में कुछ भारी लग रहा है?
अपनी बात कृष्ण से कहिए — बिना किसी फ़ैसले के, बस एक सच्ची बातचीत। शुरुआत मुफ़्त।
कृष्ण से बात करें →