भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 4, श्लोक 41–42 | ज्ञानकर्मसंन्यासयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·2 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 4, श्लोक 41–42 | ज्ञानकर्मसंन्यासयोग | अर्थ सहित

चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण ने ज्ञान, कर्म और संन्यास के परस्पर संबंध को विस्तार से समझाया है। अब अध्याय के अंतिम दो श्लोकों में वे इस पूरे उपदेश का सार देते हैं और अर्जुन को कर्तव्य-पथ पर खड़े होने की प्रेरणा देते हैं।

श्लोक 4.41

वक्ता: श्रीकृष्ण

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥4.41॥

yoga-sannyasta-karmāṇaṁ jñāna-sañchhinna-sanśhayam / ātmavantaṁ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya

हिंदी अनुवाद: हे धनञ्जय! जिसने योग के द्वारा समस्त कर्मों से अपना संबंध तोड़ लिया है और ज्ञान के द्वारा जिसके सभी संशय नष्ट हो गए हैं, ऐसे आत्म-परायण मनुष्य को कर्म नहीं बाँधते।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि कर्म-बंधन से मुक्ति के लिए दो बातें आवश्यक हैं — योग और ज्ञान। 'योगसंन्यस्तकर्माणम्' का अर्थ है वह व्यक्ति जिसने समभाव से कर्म करते हुए उनके फल और आसक्ति का त्याग कर दिया है। 'ज्ञानसंछिन्नसंशयम्' का अर्थ है जिसके मन के सब संदेह ज्ञान से कट गए हैं। ऐसा 'आत्मवान्' — अर्थात् अपने स्वरूप में स्थित — मनुष्य कर्म करते हुए भी उनसे बँधता नहीं। कर्म बंधन नहीं बनते, क्योंकि उनके पीछे न अहंकार है, न फल की लालसा।

आज के जीवन में: जब हम अपना काम समभाव और स्पष्ट विवेक से करते हैं, तो वह काम हमें दबाता नहीं, बल्कि हम उससे मुक्त रहते हैं।


श्लोक 4.42

वक्ता: श्रीकृष्ण

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥4.42॥

tasmād ajñāna-sambhūtaṁ hṛit-sthaṁ jñānāsinātmanaḥ / chhittvainaṁ sanśhayaṁ yogam ātiṣhṭhottiṣhṭha bhārata

हिंदी अनुवाद: इसलिए हे भरतवंशी! अपने हृदय में बसे इस अज्ञानजनित संशय को ज्ञान की तलवार से काट डाल, योग में स्थित हो जा और उठ खड़ा हो।

भावार्थ: यह श्लोक चौथे अध्याय का समापन और अर्जुन को दिया गया सीधा आह्वान है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संशय का मूल कारण अज्ञान है और वह संशय हृदय में बैठा है — 'हृत्स्थं संशयम्'। इसे मिटाने का साधन है 'ज्ञानासि' — ज्ञान रूपी तलवार। जब भीतर का संशय कट जाए, तब 'योगमातिष्ठ' — समभाव में स्थित हो जाओ — और 'उत्तिष्ठ' — उठो, अपने कर्तव्य की ओर बढ़ो। यह केवल अर्जुन को युद्ध के लिए नहीं, बल्कि हर मनुष्य को अपने धर्म-पथ पर खड़े होने की प्रेरणा है।

आज के जीवन में: मन के संशय को ज्ञान और विवेक से दूर करके अपने कर्तव्य पर दृढ़ता से खड़े हो जाना — यही जीवन की सबसे बड़ी साधना है।


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