भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 5, श्लोक 11–20 | कर्मसंन्यासयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 5, श्लोक 11–20 | कर्मसंन्यासयोग | अर्थ सहित

पाँचवें अध्याय के पहले भाग में श्रीकृष्ण ने कर्मसंन्यास और कर्मयोग की तुलना करते हुए यह स्पष्ट किया कि दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, किंतु कर्मयोग अधिक सुगम है। इस दूसरे भाग में वे बताते हैं कि कर्मयोगी किस भाव से कर्म करता है, फल के त्याग से कैसी शांति मिलती है, और ज्ञान के उदय होने पर साधक किस अवस्था को प्राप्त होता है। अंत में समदर्शिता और स्थिरबुद्धि की दशा का वर्णन होता है।

श्लोक 5.11

वक्ता: श्रीकृष्ण

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥5.11॥

kāyena manasā buddhyā kevalair indriyair api / yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṁ tyaktvātma-śhuddhaye

हिंदी अनुवाद: कर्मयोगी आसक्ति का त्याग करके केवल शरीर, मन, बुद्धि और इंद्रियों के द्वारा अंतःकरण की शुद्धि के लिए ही कर्म करते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि कर्मयोगी का कर्म करने का ढंग साधारण मनुष्य से भिन्न होता है। वे शरीर, मन, बुद्धि और इंद्रियों — सभी साधनों का उपयोग करते हैं, परंतु इनमें 'मेरापन' या आसक्ति नहीं रखते। 'आत्मशुद्धये' अर्थात् अंतःकरण की शुद्धि — यही उनका एकमात्र उद्देश्य है। कर्म होते हैं, पर उनमें 'मैं कर रहा हूँ' का अहंकार नहीं होता। यही भाव कर्म को बंधन से मुक्त करता है।

आज के जीवन में: जो कार्य हम करें, उसे अहंकार और फल की चाह छोड़कर करें — यही भाव कर्म को साधना बना देता है।


श्लोक 5.12

वक्ता: श्रीकृष्ण

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥5.12॥

yuktaḥ karma-phalaṁ tyaktvā śhāntim āpnoti naiṣhṭhikīm / ayuktaḥ kāma-kāreṇa phale sakto nibadhyate

हिंदी अनुवाद: कर्मयोगी कर्मफल का त्याग करके स्थायी शांति को प्राप्त होता है, जबकि कामना से प्रेरित और फल में आसक्त मनुष्य बंधन में पड़ जाता है।

भावार्थ: इस श्लोक में दो प्रकार के मनुष्यों की तुलना है। 'युक्तः' अर्थात् जो कर्मयोग में स्थित है, वह फल की चाह छोड़ देता है और 'नैष्ठिकी शांति' — अर्थात् दृढ़ और स्थायी शांति — को पाता है। दूसरी ओर 'अयुक्तः' — जो कामना से भरा है और फल में आसक्त है — वह बंधन में फँसता जाता है। फल का त्याग शांति का द्वार है, फल की चाह बंधन का।

आज के जीवन में: परिणाम की चिंता छोड़कर कर्तव्य करने से मन को स्थायी शांति मिलती है।


श्लोक 5.13

वक्ता: श्रीकृष्ण

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥5.13॥

sarva-karmāṇi manasā sannyasyāste sukhaṁ vaśhī / nava-dvāre pure dehī naiva kurvan na kārayan

हिंदी अनुवाद: जिसने मन और इंद्रियों को वश में कर लिया है, वह देहधारी पुरुष मन से सब कर्मों का त्याग करके नौ द्वारों वाले इस शरीर-नगर में न करते हुए और न करवाते हुए सुखपूर्वक स्थित रहता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ शरीर को 'नवद्वारे पुरे' — नौ द्वारों वाला नगर — कहते हैं। ये नौ द्वार हैं दो आँखें, दो कान, दो नासिका-छिद्र, एक मुख और दो मल-मूत्र के द्वार। 'वशी' अर्थात् जिसने इंद्रियों और मन को वश में किया है, वह आत्मा इस नगर में रहते हुए भी कर्ता नहीं बनती। वह जानता है कि कर्म प्रकृति करती है, आत्मा नहीं।

आज के जीवन में: जो मन और इंद्रियों पर संयम रखता है, वह संसार में रहते हुए भी भीतर से शांत और स्वतंत्र रहता है।


श्लोक 5.14

वक्ता: श्रीकृष्ण

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥5.14॥

na kartṛitvaṁ na karmāṇi lokasya sṛijati prabhuḥ / na karma-phala-saṅyogaṁ svabhāvas tu pravartate

हिंदी अनुवाद: परमेश्वर न मनुष्यों के कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं; यह सब तो स्वभाव — प्रकृति — ही करती है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा किसी को कर्म करने के लिए विवश नहीं करते, न किसी के कर्म का फल निर्धारित करते हैं। 'स्वभावस्तु प्रवर्तते' — अर्थात् प्रकृति और उसके गुण ही सब कुछ चलाते हैं। जीव अपने स्वभाव और संस्कारों के अनुसार कर्म करता है। परमात्मा इस सब से परे, निर्लिप्त हैं। यह श्लोक ईश्वर की निर्लिप्तता को समझाता है।

आज के जीवन में: परमात्मा किसी के सुख-दुःख के लिए उत्तरदायी नहीं; हमारे कर्म और स्वभाव ही हमारी परिस्थितियाँ बनाते हैं।


श्लोक 5.15

वक्ता: श्रीकृष्ण

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥5.15॥

nādatte kasyachit pāpaṁ na chaiva sukṛitaṁ vibhuḥ / ajñānenāvṛitaṁ jñānaṁ tena muhyanti jantavaḥ

हिंदी अनुवाद: सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पाप को और न किसी के पुण्य को ग्रहण करते हैं; किंतु अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है, इसीलिए सब जीव मोहित हो रहे हैं।

भावार्थ: पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'विभुः' — सर्वव्यापी परमात्मा — न पाप लेते हैं, न पुण्य। फिर जीव मोह में क्यों पड़ा है? इसका कारण है अज्ञान, जो ज्ञान को ढक लेता है। जब तक यह आवरण है, जीव यह नहीं जान पाता कि वह वास्तव में कर्ता नहीं है। मोह का मूल कारण अज्ञान है, न कि ईश्वर की इच्छा।

आज के जीवन में: जीवन की भ्रांतियों का कारण बाहर नहीं, भीतर का अज्ञान है — जो ज्ञान से ही दूर होता है।


श्लोक 5.16

वक्ता: श्रीकृष्ण

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥5.16॥

jñānena tu tad ajñānaṁ yeṣhāṁ nāśhitam ātmanaḥ / teṣhām āditya-vaj jñānaṁ prakāśhayati tat param

हिंदी अनुवाद: परंतु जिन्होंने आत्मज्ञान से उस अज्ञान का नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्य की भाँति परम तत्त्व को प्रकाशित कर देता है।

भावार्थ: पिछले श्लोक में अज्ञान की बात थी, यहाँ उसके निवारण का मार्ग है। 'आदित्यवत्' — जैसे सूर्य उदय होते ही अंधकार मिट जाता है और सब कुछ दिखने लगता है, वैसे ही जब आत्मज्ञान प्रकट होता है तो अज्ञान का आवरण हट जाता है और परम तत्त्व — परमात्मा — स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं। ज्ञान ही वह दीपक है जो मोह के अंधकार को नष्ट करता है।

आज के जीवन में: सच्चा ज्ञान अंधकार की तरह छाए भ्रम को उसी प्रकार मिटा देता है जैसे सूर्य अँधेरे को।


श्लोक 5.17

वक्ता: श्रीकृष्ण

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥5.17॥

tad-buddhayas tad-ātmānas tan-niṣhṭhās tat-parāyaṇāḥ / gachchhantyapunar-āvṛittiṁ jñāna-nirdhūta-kalmaṣhāḥ

हिंदी अनुवाद: जिनकी बुद्धि, मन और स्थिति परमात्मा में लीन है और जो उन्हीं को परम लक्ष्य मानते हैं, वे ज्ञान से पापरहित होकर उस गति को प्राप्त होते हैं जहाँ से लौटना नहीं होता।

भावार्थ: 'तद्बुद्धयः' — जिनकी बुद्धि उसी परम तत्त्व में रमी है, 'तदात्मानः' — जिनका मन उसी में लीन है, 'तन्निष्ठाः' — जो उसी में स्थित हैं, 'तत्परायणाः' — जो उसी को परम आश्रय मानते हैं — ऐसे साधक ज्ञान के द्वारा कल्मष — अर्थात् पाप या मल — से मुक्त होकर 'अपुनरावृत्ति' को प्राप्त होते हैं, जहाँ से पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता।

आज के जीवन में: जो मन, बुद्धि और जीवन का लक्ष्य परमात्मा को बना लेते हैं, वे अंततः मुक्ति को प्राप्त होते हैं।


श्लोक 5.18

वक्ता: श्रीकृष्ण

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥5.18॥

vidyā-vinaya-sampanne brāhmaṇe gavi hastini / śhuni chaiva śhva-pāke cha paṇḍitāḥ sama-darśhinaḥ

हिंदी अनुवाद: ज्ञानी महापुरुष विद्या और विनय से संपन्न ब्राह्मण में, चांडाल में, गाय में, हाथी में और कुत्ते में भी समान रूप से परमात्मा को देखते हैं।

भावार्थ: 'पंडिताः समदर्शिनः' — ज्ञानी समदर्शी होते हैं। वे बाहरी भेद — जाति, रूप, योनि — से परे जाकर सब में एक ही चेतना को देखते हैं। विद्वान ब्राह्मण और अस्पृश्य माने जाने वाले चांडाल में, पशुओं में — सब में वही एक परमात्मा है। यह समदर्शिता केवल बौद्धिक नहीं, अनुभव की अवस्था है। जब भीतर का ज्ञान परिपक्व होता है, तब बाहर का भेद गौण हो जाता है।

आज के जीवन में: सच्चा ज्ञान मनुष्य को सब प्राणियों में एक ही सत्ता के दर्शन कराता है — यही समदर्शिता है।


श्लोक 5.19

वक्ता: श्रीकृष्ण

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥5.19॥

ihaiva tair jitaḥ sargo yeṣhāṁ sāmye sthitaṁ manaḥ / nirdoṣhaṁ hi samaṁ brahma tasmād brahmaṇi te sthitāḥ

हिंदी अनुवाद: जिनका अंतःकरण समता में स्थित है, उन्होंने इसी जीवन में संपूर्ण संसार को जीत लिया है; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।

भावार्थ: पिछले श्लोक में समदर्शिता का वर्णन था, यहाँ उसका फल बताया गया है। 'साम्ये स्थितं मनः' — जिनका मन समता में टिका है, उन्होंने 'सर्गः' — अर्थात् संसार-चक्र — को इसी जीवन में जीत लिया। ब्रह्म स्वयं 'निर्दोषं' और 'समं' है — उसमें कोई विषमता नहीं। जो साधक इस समभाव को पा लेता है, वह ब्रह्म में ही स्थित हो जाता है।

आज के जीवन में: समभाव — सुख-दुःख, मान-अपमान में एकसमान रहना — ही इस जीवन में मुक्ति का अनुभव है।


श्लोक 5.20

वक्ता: श्रीकृष्ण

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥5.20॥

na prahṛiṣhyet priyaṁ prāpya nodvijet prāpya chāpriyam / sthira-buddhir asammūḍho brahma-vid brahmaṇi sthitaḥ

हिंदी अनुवाद: जो प्रिय मिलने पर हर्षित नहीं होता और अप्रिय मिलने पर व्याकुल नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, मोहरहित और ब्रह्म को जाननेवाला मनुष्य ब्रह्म में स्थित है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण ब्रह्मस्थिति के व्यावहारिक लक्षण बताते हैं। 'स्थिरबुद्धिः' — जिसकी बुद्धि डाँवाडोल नहीं होती, 'असम्मूढः' — जो मोह से रहित है, 'ब्रह्मवित्' — जो ब्रह्म का ज्ञाता है — ऐसा व्यक्ति प्रिय प्राप्त होने पर उछलता नहीं और अप्रिय आने पर घबराता नहीं। यह स्थिति बाहरी वैराग्य नहीं, भीतरी दृढ़ता है जो ज्ञान से आती है।

आज के जीवन में: जो अनुकूल में उत्साहित और प्रतिकूल में विचलित नहीं होता, वही सच्चे अर्थों में स्थिरबुद्धि है।


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