भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 5, श्लोक 21–29 | कर्मसंन्यासयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·7 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 5, श्लोक 21–29 | कर्मसंन्यासयोग | अर्थ सहित

अध्याय पाँच के पूर्वार्ध में श्रीकृष्ण ने कर्मसंन्यास और कर्मयोग की तुलना करते हुए बताया कि दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, और ज्ञानी पुरुष कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता। इस अंतिम खंड में वे उस अवस्था का वर्णन करते हैं जिसमें साधक बाहरी सुखों से विरक्त होकर भीतर के अक्षय आनंद को पाता है, काम-क्रोध के वेग को जीतता है, और अंत में परमात्मा को ही समस्त यज्ञों का भोक्ता, सर्वलोक का ईश्वर और सबका मित्र जानकर शांति प्राप्त करता है।

श्लोक 5.21

वक्ता: श्रीकृष्ण

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥5.21॥

bāhya-sparśheṣhvasaktātmā vindatyātmani yat sukham / sa brahma-yoga-yuktātmā sukham akṣhayam aśhnute

हिंदी अनुवाद: जिसका अंतःकरण बाहरी विषयों में आसक्त नहीं है, वह साधक आत्मा में स्थित सुख को प्राप्त होता है। फिर ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित वह मनुष्य अक्षय सुख का अनुभव करता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि बाहरी इंद्रिय-विषयों में रमने से जो सुख मिलता है, वह क्षणिक है। जो साधक उन विषयों में 'असक्तात्मा' — अर्थात् अनासक्त चित्त वाला — होता है, वह अपने भीतर ही सुख खोज लेता है। जब वह 'ब्रह्मयोगयुक्तात्मा' — ब्रह्म में एकाकार — हो जाता है, तब उसे जो सुख मिलता है वह 'अक्षय' है, अर्थात् कभी घटता या नष्ट नहीं होता। यह सुख किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं, इसलिए कोई परिस्थिति उसे छीन नहीं सकती।

आज के जीवन में: जो सुख हम अपने भीतर खोजते हैं, वह स्थायी होता है; बाहरी वस्तुओं पर टिका सुख सदा अधूरा रहता है।


श्लोक 5.22

वक्ता: श्रीकृष्ण

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥5.22॥

ye hi sansparśha-jā bhogā duḥkha-yonaya eva te / ādyantavantaḥ kaunteya na teṣhu ramate budhaḥ

हिंदी अनुवाद: हे कुंतीनंदन! इंद्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले भोग आदि और अंत वाले हैं, इसलिए वे दुःख के ही कारण हैं। विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ 'संस्पर्शजा भोगा' — इंद्रियों के विषयों के स्पर्श से उत्पन्न सुख — की सीमा बताते हैं। ये भोग 'आद्यन्तवन्तः' हैं, अर्थात् इनका आरंभ और अंत दोनों हैं। जो वस्तु मिलती है वह छिन भी जाती है, और यही छिनना दुःख देता है। इसीलिए 'बुधः' — विवेकी पुरुष — इन भोगों में आसक्त नहीं होता। वह उनसे भागता नहीं, पर उनमें डूबता भी नहीं।

आज के जीवन में: जो सुख आरंभ और अंत वाला है, उसमें पूरी तरह डूब जाना बुद्धिमानी नहीं; विवेकी व्यक्ति भोगों का उपयोग करता है, उनका दास नहीं बनता।


श्लोक 5.23

वक्ता: श्रीकृष्ण

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥5.23॥

śhaknotīhaiva yaḥ soḍhuṁ prāk śharīra-vimokṣhaṇāt / kāma-krodhodbhavaṁ vegaṁ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ

हिंदी अनुवाद: इस मनुष्य शरीर में रहते हुए जो व्यक्ति शरीर छूटने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन कर लेता है, वही योगी है और वही सुखी है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक व्यावहारिक कसौटी देते हैं — 'इहैव', अर्थात् इसी जीवन में, इसी शरीर में। 'कामक्रोधोद्भवं वेगम्' — काम और क्रोध से उठने वाले आवेग — को शरीर रहते ही सहन करने की क्षमता जिसमें है, वही सच्चा योगी है। यह सहन करना दमन नहीं, बल्कि उस आवेग को पहचानकर उसके वश में न होना है। ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में सुखी रह सकता है।

आज के जीवन में: क्रोध या लालसा का आवेग उठे और हम उसके वश में न हों — यही आत्मजय की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण परीक्षा है।


श्लोक 5.24

वक्ता: श्रीकृष्ण

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥5.24॥

yo 'ntaḥ-sukho 'ntar-ārāmas tathāntar-jyotir eva yaḥ / sa yogī brahma-nirvāṇaṁ brahma-bhūto 'dhigachchhati

हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य परमात्मा में ही सुख पाता है, परमात्मा में ही रमण करता है और परमात्मा में ही प्रकाश पाता है, वह ब्रह्म में स्थित योगी निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होता है।

भावार्थ: इस श्लोक में तीन विशेषण एक साथ आते हैं — 'अंतःसुखः' (भीतर सुख वाला), 'अंतरारामः' (भीतर रमण करने वाला), और 'अंतर्ज्योतिः' (भीतर प्रकाश वाला)। तीनों में 'अंतर्' उपसर्ग है — सब कुछ भीतर। ऐसा योगी 'ब्रह्मभूतः' — ब्रह्म-स्वरूप — होकर 'ब्रह्मनिर्वाण' को प्राप्त होता है। निर्वाण का अर्थ यहाँ परम मुक्ति है — जहाँ अहंकार का बुझ जाना और ब्रह्म में विलीन हो जाना एक ही बात है।

आज के जीवन में: जिसे बाहर से कुछ नहीं चाहिए क्योंकि भीतर सब कुछ है — वही सच्ची स्वतंत्रता की अवस्था है।


श्लोक 5.25

वक्ता: श्रीकृष्ण

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥5.25॥

labhante brahma-nirvāṇam ṛiṣhayaḥ kṣhīṇa-kalmaṣhāḥ / chhinna-dvaidhā yatātmānaḥ sarva-bhūta-hite ratāḥ

हिंदी अनुवाद: जिनके सभी दोष नष्ट हो गए हैं, जिनके सभी संशय मिट गए हैं, जिनका मन-बुद्धि-इंद्रियाँ वश में हैं और जो सभी प्राणियों के हित में लगे हैं — वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

भावार्थ: यहाँ 'ऋषयः' — ज्ञानी साधक — की चार विशेषताएँ बताई गई हैं: 'क्षीणकल्मषाः' (दोष-रहित), 'छिन्नद्वैधाः' (संशय-मुक्त), 'यतात्मानः' (संयमी), और 'सर्वभूतहिते रताः' (सबके हित में रत)। ध्यान देने योग्य है कि मुक्ति केवल व्यक्तिगत साधना से नहीं, बल्कि सबके प्रति हितभाव से भी जुड़ी है। यह सामाजिक करुणा और आत्मशुद्धि दोनों को एक साथ रखता है।

आज के जीवन में: आत्मशुद्धि और सबके प्रति हितभाव — ये दोनों साथ चलते हैं; केवल अपनी मुक्ति की चिंता करना पर्याप्त नहीं।


श्लोक 5.26

वक्ता: श्रीकृष्ण

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥5.26॥

kāma-krodha-viyuktānāṁ yatīnāṁ yata-chetasām / abhito brahma-nirvāṇaṁ vartate viditātmanām

हिंदी अनुवाद: काम और क्रोध से सर्वथा रहित, मन को जीते हुए और स्वरूप का साक्षात्कार किए हुए संयमी साधकों के लिए निर्वाण ब्रह्म दोनों ओर से — शरीर रहते और शरीर छूटने के बाद भी — परिपूर्ण है।

भावार्थ: 'अभितः' शब्द का अर्थ है — दोनों ओर से, हर दिशा में। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जो 'यती' — संयमी साधक — 'कामक्रोधवियुक्त' और 'यतचेतस्' (संयत चित्त वाले) हैं, उनके लिए ब्रह्मनिर्वाण न केवल मृत्यु के बाद, बल्कि इसी जीवन में भी उपलब्ध है। 'विदितात्मनाम्' — जिन्होंने आत्मा को जान लिया — उनके लिए मुक्ति कोई भविष्य की घटना नहीं, वर्तमान की अवस्था है।

आज के जीवन में: जो काम-क्रोध से मुक्त होकर आत्मज्ञान में स्थित है, उसके लिए मुक्ति मृत्यु के बाद नहीं, इसी क्षण उपलब्ध है।


श्लोक 5.27

वक्ता: श्रीकृष्ण

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥5.27॥

sparśhān kṛitvā bahir bāhyānśh chakṣhuśh chaivāntare bhruvoḥ / prāṇāpānau samau kṛitvā nāsābhyantara-chāriṇau / yatendriya-mano-buddhir munir mokṣha-parāyaṇaḥ / vigatechchhā-bhaya-krodho yaḥ sadā mukta eva saḥ

हिंदी अनुवाद: बाहरी विषयों को बाहर ही छोड़कर, नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के बीच में स्थिर करके, और नासिका में चलने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके —

भावार्थ: यह श्लोक ध्यान की एक विशेष विधि का वर्णन करता है। 'बाह्यस्पर्शान् बहिः कृत्वा' — बाहरी विषयों को मन से बाहर करना — एकाग्रता की पहली शर्त है। 'चक्षुः भ्रुवोः अंतरे' — दृष्टि को भौंहों के मध्य स्थिर करना — ध्यान की एक प्रचलित विधि है। 'प्राणापानौ समौ' — प्राण और अपान को संतुलित करना — श्वास की साधना है। यह श्लोक अगले श्लोक के साथ मिलकर पूरा अर्थ देता है।


श्लोक 5.28

वक्ता: श्रीकृष्ण

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥5.28॥

yatendriya-mano-buddhir munir mokṣa-parāyaṇaḥ vigatecchā-bhaya-krodho yaḥ sadā mukta eva saḥ

हिंदी अनुवाद: जिसकी इंद्रियाँ, मन और बुद्धि वश में हैं, जो मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानता है और जो इच्छा, भय तथा क्रोध से सर्वथा रहित है — वह मुनि सदा मुक्त ही है।

भावार्थ: पिछले श्लोक में ध्यान की बाहरी विधि बताई गई थी — दृष्टि, श्वास, और विषयों से विरति। इस श्लोक में उसका परिणाम बताया गया है। 'यतेंद्रियमनोबुद्धिः' — इंद्रियाँ, मन और बुद्धि तीनों पर संयम — और 'विगतेच्छाभयक्रोधः' — इच्छा, भय और क्रोध का अभाव — ये जिस मुनि में हैं, वह 'सदा मुक्त एव' — सदा ही मुक्त है। मुक्ति कोई घटना नहीं, वह एक अवस्था है।

आज के जीवन में: इंद्रियों, मन और बुद्धि पर संयम और इच्छा-भय-क्रोध से मुक्ति — यही जीवन में मोक्ष की वास्तविक अनुभूति है।


श्लोक 5.29

वक्ता: श्रीकृष्ण

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥5.29॥

bhoktāraṁ yajña-tapasāṁ sarva-loka-maheśhvaram / suhṛidaṁ sarva-bhūtānāṁ jñātvā māṁ śhāntim ṛichchhati

हिंदी अनुवाद: मुझे सभी यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का महान् ईश्वर और सभी प्राणियों का निःस्वार्थ मित्र जानकर भक्त शांति को प्राप्त होता है।

भावार्थ: अध्याय के अंतिम श्लोक में श्रीकृष्ण अपना परिचय तीन रूपों में देते हैं — 'भोक्ता' (यज्ञ-तप का फल ग्रहण करने वाला), 'सर्वलोकमहेश्वर' (सभी लोकों का परम ईश्वर), और 'सुहृद् सर्वभूतानाम्' (सभी प्राणियों का बिना किसी स्वार्थ के मित्र)। जो साधक इन तीनों को जान लेता है, वह 'शांतिम् ऋच्छति' — शांति को प्राप्त होता है। यह शांति भय से नहीं, बल्कि परमात्मा के प्रति विश्वास और प्रेम से उत्पन्न होती है।

आज के जीवन में: परमात्मा को सबका निःस्वार्थ मित्र जानने से जो विश्वास जागता है, वही सच्ची और स्थायी शांति का आधार है।


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