भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 1–10 | आत्मसंयमयोग | अर्थ सहित
पाँचवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग और ज्ञानयोग की तुलना करते हुए बताया कि फलासक्ति छोड़कर कर्म करना ही सच्चा संन्यास है। छठे अध्याय में वे इसी विचार को आगे बढ़ाते हैं और आत्मसंयम तथा ध्यान के मार्ग का विस्तार से वर्णन करते हैं। इस पहले खंड में श्रीकृष्ण सच्चे संन्यासी और योगी की पहचान बताते हैं, आत्मा को अपना मित्र और शत्रु दोनों बताते हैं, और एकांत में मन को स्थिर करने की साधना का आधार रखते हैं।
श्लोक 6.1
वक्ता: श्रीकृष्ण
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥6.1॥
śhrī bhagavān uvācha / anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ / sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — जो मनुष्य कर्मफल का आश्रय न लेकर अपना कर्तव्य-कर्म करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है। केवल अग्नि का त्याग कर देने से कोई संन्यासी नहीं होता और केवल क्रियाओं को छोड़ देने से कोई योगी नहीं होता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि संन्यास और योग का असली अर्थ बाहरी त्याग नहीं है। 'अनाश्रितः कर्मफलम्' का अर्थ है — फल की चाह को आधार न बनाना। जो व्यक्ति यज्ञ की अग्नि छोड़ देता है या कर्म करना बंद कर देता है, वह संन्यासी या योगी नहीं कहलाता। सच्चा संन्यास और योग एक ही है — फलासक्ति रहित होकर अपना कर्तव्य निभाना। यह परिभाषा पाँचवें अध्याय के विचार को और स्पष्ट करती है।
आज के जीवन में: काम करते हुए भी यदि फल की चिंता छोड़ दें, तो वही सच्चा त्याग है — बाहरी दिखावे में नहीं।
श्लोक 6.2
वक्ता: श्रीकृष्ण
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥6.2॥
yaṁ sannyāsam iti prāhur yogaṁ taṁ viddhi pāṇḍava / na hyasannyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaśhchana
हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! लोग जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही तुम योग समझो; क्योंकि जिसने संकल्पों का त्याग नहीं किया, वह कोई भी योगी नहीं बन सकता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ संन्यास और योग को एक ही बताते हैं। 'संकल्प' का अर्थ है — मन में उठने वाली कामनाएँ और इच्छाएँ। जब तक मन में फल पाने की, भोग की या किसी विशेष परिणाम की चाह बनी रहती है, तब तक योग की स्थिति नहीं आती। इसलिए योगी बनने की पहली शर्त है — संकल्पों का, अर्थात् कामनाओं का त्याग। यह श्लोक पिछले श्लोक की बात को और गहरा करता है।
आज के जीवन में: मन की कामनाओं को शांत किए बिना न योग सधता है, न सच्चा त्याग होता है।
श्लोक 6.3
वक्ता: श्रीकृष्ण
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥6.3॥
ārurukṣhor muner yogaṁ karma kāraṇam uchyate / yogārūḍhasya tasyaiva śhamaḥ kāraṇam uchyate
हिंदी अनुवाद: जो मननशील साधक योग में आरूढ़ होना चाहता है, उसके लिए कर्म करना साधन बताया गया है; और जो योगारूढ़ हो चुका है, उसके लिए शम — अर्थात् मन की शांति — साधन बताया गया है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ साधना के दो चरण बताते हैं। 'आरुरुक्षु' अर्थात् जो योग की ओर चढ़ना चाहता है, उसके लिए निष्काम कर्म का अभ्यास आवश्यक है। 'योगारूढ़' अर्थात् जो योग की अवस्था में पहुँच चुका है, उसके लिए 'शम' — मन की स्थिरता और शांति — ही आगे का मार्ग है। इस प्रकार कर्म और शांति दोनों अपने-अपने स्तर पर साधन हैं, विरोधी नहीं।
आज के जीवन में: साधना के प्रारंभ में कर्म और परिपक्वता पर मन की शांति — दोनों अपने-अपने समय पर आवश्यक हैं।
श्लोक 6.4
वक्ता: श्रीकृष्ण
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥6.4॥
yadā hi nendriyārtheṣhu na karmasv-anuṣhajjate / sarva-saṅkalpa-sannyāsī yogārūḍhas tadochyate
हिंदी अनुवाद: जिस समय मनुष्य न इंद्रियों के विषयों में आसक्त होता है और न कर्मों में, उस समय वह सभी संकल्पों का त्यागी होकर योगारूढ़ कहलाता है।
भावार्थ: यह श्लोक योगारूढ़ की स्थिति का लक्षण बताता है। जब साधक इंद्रियों के भोगों की ओर नहीं खिंचता और कर्मों में भी आसक्ति नहीं रहती, तब उसके सभी संकल्प — सभी कामनाएँ — स्वाभाविक रूप से शांत हो जाते हैं। यह अवस्था बाहरी प्रयास से नहीं, बल्कि भीतरी परिपक्वता से आती है। 'सर्वसंकल्पसंन्यासी' — सभी कामनाओं का त्यागी — ही योगारूढ़ है।
आज के जीवन में: जब मन भोग और कर्म दोनों में आसक्त नहीं रहता, तब भीतर की एक गहरी स्थिरता स्वयं प्रकट होती है।
श्लोक 6.5
वक्ता: श्रीकृष्ण
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥6.5॥
uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet / ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
हिंदी अनुवाद: अपने द्वारा ही अपना उद्धार करे, अपने को नीचे न गिरने दे; क्योंकि आप ही अपने मित्र हैं और आप ही अपने शत्रु हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सत्य कहते हैं — मनुष्य की उन्नति और पतन दोनों का कारण वह स्वयं है। 'उद्धरेत् आत्मना आत्मानम्' — अपने आप को अपने ही बल से ऊपर उठाओ। कोई बाहरी शक्ति न तो पूरी तरह बचा सकती है, न डुबो सकती है। जब मनुष्य अपनी इंद्रियों और मन को वश में रखता है, तो वह अपना मित्र है; जब उनके वश में हो जाता है, तो वह अपना शत्रु बन जाता है।
आज के जीवन में: अपने जीवन की दिशा का सबसे बड़ा निर्णायक आप स्वयं हैं — न परिस्थिति, न कोई और।
श्लोक 6.6
वक्ता: श्रीकृष्ण
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥6.6॥
bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ / anātmanas tu śhatrutve vartetātmaiva śhatru-vat
हिंदी अनुवाद: जिसने अपने मन और इंद्रियों को जीत लिया है, उसके लिए आत्मा ही मित्र है; और जिसने अपने को नहीं जीता, उसके लिए यही आत्मा शत्रु की तरह व्यवहार करती है।
भावार्थ: पिछले श्लोक की बात को यहाँ और स्पष्ट किया गया है। 'जितात्मा' — जिसने अपने आप को जीत लिया — उसके लिए आत्मा बंधु है, क्योंकि वह उसे ऊपर उठाती है। 'अनात्मा' — जो अपने मन और इंद्रियों के वश में है — उसके लिए वही आत्मा शत्रु की भूमिका निभाती है, क्योंकि अनियंत्रित मन उसे बार-बार भटकाता और गिराता है। यहाँ 'आत्मा' से तात्पर्य मन और इंद्रियों सहित अपने भीतर की शक्ति से है।
आज के जीवन में: जो अपने मन का स्वामी है, उसका मन उसका सबसे बड़ा सहायक बन जाता है।
श्लोक 6.7
वक्ता: श्रीकृष्ण
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥6.7॥
jitātmanaḥ praśhāntasya paramātmā samāhitaḥ / śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu tathā mānāpamānayoḥ
हिंदी अनुवाद: जिसने अपने आप पर विजय पा ली है और जो शीत-उष्ण, सुख-दुःख तथा मान-अपमान में निर्विकार रहता है, उस शांत पुरुष को परमात्मा नित्य प्राप्त हैं।
भावार्थ: 'जितात्मनः प्रशान्तस्य' — जिसने स्वयं को जीत लिया है और जो शांत है — ऐसे व्यक्ति के लिए परमात्मा सदा सुलभ हैं। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, मान-अपमान — ये सभी जीवन में आते-जाते रहते हैं। जो इनसे विचलित नहीं होता, उसका चित्त स्थिर रहता है और उस स्थिर चित्त में परमात्मा का अनुभव स्वाभाविक रूप से होता है। यह समभाव ही योग की परिपक्वता का चिह्न है।
आज के जीवन में: जो सुख-दुःख और मान-अपमान में समान रहता है, उसका मन परमात्मा के निकट होता है।
श्लोक 6.8
वक्ता: श्रीकृष्ण
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥6.8॥
jñāna-vijñāna-tṛiptātmā kūṭa-stho vijitendriyaḥ / yukta ityuchyate yogī sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ
हिंदी अनुवाद: जिसका अंतःकरण ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो कूट की तरह निर्विकार और जितेंद्रिय है, और जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना समान हैं — ऐसा योगी युक्त अर्थात् योगारूढ़ कहलाता है।
भावार्थ: 'ज्ञान' अर्थात् शास्त्र से प्राप्त बोध और 'विज्ञान' अर्थात् अनुभव से प्राप्त प्रत्यक्ष ज्ञान — दोनों से जिसका मन तृप्त है, उसे बाहरी वस्तुओं की लालसा नहीं रहती। 'कूटस्थ' अर्थात् निहाई की तरह अडिग और निर्विकार। मिट्टी, पत्थर और सोने में समान दृष्टि रखना यह दर्शाता है कि उसकी बुद्धि वस्तुओं के मूल्य से ऊपर उठ चुकी है। यही योगारूढ़ की पहचान है।
आज के जीवन में: जब भीतर से तृप्ति हो, तो बाहरी वस्तुएँ चाहे मिट्टी हों या सोना — मन समान रहता है।
श्लोक 6.9
वक्ता: श्रीकृष्ण
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥6.9॥
suhṛin-mitrāryudāsīna-madhyastha-dveṣhya-bandhuṣhu / sādhuṣhvapi cha pāpeṣhu sama-buddhir viśhiṣhyate
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और संबंधियों में तथा साधु और पापाचारी में भी समान बुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।
भावार्थ: यह श्लोक समबुद्धि की व्यापकता दर्शाता है। 'सुहृद्' — बिना स्वार्थ के भला चाहने वाला, 'मित्र' — प्रेमी, 'अरि' — शत्रु, 'उदासीन' — तटस्थ, 'मध्यस्थ' — बीच में रहने वाला, 'द्वेष्य' — जिससे द्वेष हो, 'बंधु' — संबंधी — इन सभी में और साधु तथा पापी में भी जो समान दृष्टि रखता है, वह पिछले श्लोकों में वर्णित योगी से भी विशिष्ट है। यह समभाव आत्मजय की पराकाष्ठा है।
आज के जीवन में: प्रिय और अप्रिय, साधु और दुराचारी — सभी में समान दृष्टि रखना ही सच्ची आत्मिक परिपक्वता है।
श्लोक 6.10
वक्ता: श्रीकृष्ण
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥6.10॥
yogī yuñjīta satatam ātmānaṁ rahasi sthitaḥ / ekākī yata-chittātmā nirāśhīr aparigrahaḥ
हिंदी अनुवाद: योगी एकांत में अकेला रहकर, मन और शरीर को वश में रखते हुए, इच्छाओं और संग्रह से रहित होकर, निरंतर अपने मन को परमात्मा में लगाए।
भावार्थ: यहाँ से श्रीकृष्ण ध्यान की व्यावहारिक साधना का वर्णन आरंभ करते हैं। 'रहसि स्थितः' — एकांत में रहना, 'एकाकी' — अकेले, 'यतचित्तात्मा' — मन और शरीर को संयमित रखना, 'निराशीः' — आशाओं से मुक्त, 'अपरिग्रहः' — संग्रह न करना — ये सभी ध्यान की पूर्वशर्तें हैं। जब बाहरी और भीतरी बिखराव कम होता है, तभी मन परमात्मा में टिक सकता है।
आज के जीवन में: ध्यान के लिए एकांत, संयम और इच्छाओं की शांति — ये तीनों मिलकर मन को स्थिर करते हैं।
आगे पढ़िए
← पिछला भाग: अध्याय 5, श्लोक 21–29
अगला भाग: अध्याय 6, श्लोक 11–20 →
मन में कुछ भारी लग रहा है?
अपनी बात कृष्ण से कहिए — बिना किसी फ़ैसले के, बस एक सच्ची बातचीत। शुरुआत मुफ़्त।
कृष्ण से बात करें →