भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 11–20 | आत्मसंयमयोग | अर्थ सहित
अध्याय छह के पूर्वार्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि सच्चा संन्यासी वह है जो कर्म करते हुए भी फल की आसक्ति नहीं रखता। अब इस खंड में वे ध्यान-योग की व्यावहारिक विधि समझाते हैं — आसन कैसा हो, शरीर और मन की स्थिति कैसी हो, आहार-निद्रा में संयम क्यों आवश्यक है, और योग की सिद्धि की अवस्था कैसी दिखती है।
श्लोक 6.11
वक्ता: श्रीकृष्ण
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥6.11॥
śhuchau deśhe pratiṣhṭhāpya sthiram āsanam ātmanaḥ / nātyuchchhritaṁ nāti-nīchaṁ chailājina-kuśhottaram
हिंदी अनुवाद: साधक को चाहिए कि वह किसी शुद्ध स्थान पर अपना आसन स्थिर करे — जिस पर नीचे कुश, बीच में मृगछाला और ऊपर वस्त्र बिछा हो — और वह आसन न बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को ध्यान की बाह्य तैयारी बताते हैं। 'शुचौ देशे' अर्थात् पवित्र भूमि — जहाँ मन को बाहरी अशुद्धि न भटकाए। आसन की तीन परतें — कुश, मृगछाला और वस्त्र — क्रमशः नीचे से ऊपर बिछाई जाती हैं। आसन की ऊँचाई भी संतुलित होनी चाहिए — न इतनी ऊँची कि गिरने का भय हो, न इतनी नीची कि भूमि की नमी या कठोरता बाधा बने। यह श्लोक बताता है कि ध्यान के लिए बाहरी परिस्थिति का भी ध्यान रखना आवश्यक है।
आज के जीवन में: जो कार्य हम मन लगाकर करना चाहते हैं, उसके लिए उचित और शांत स्थान का चुनाव पहली आवश्यकता है।
श्लोक 6.12
वक्ता: श्रीकृष्ण
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥6.12॥
tatraikāgraṁ manaḥ kṛitvā yata-chittendriya-kriyaḥ / upaviśhyāsane yuñjyād yogam ātma-viśhuddhaye
हिंदी अनुवाद: उस आसन पर बैठकर, मन और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, मन को एकाग्र करे और अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
भावार्थ: बाह्य आसन के बाद अब श्रीकृष्ण आंतरिक स्थिति की बात करते हैं। 'यतचित्तेन्द्रियक्रियः' का अर्थ है — जिसने चित्त और इंद्रियों की चंचल क्रियाओं को नियंत्रित कर लिया हो। 'एकाग्रं मनः' अर्थात् मन को एक ही लक्ष्य पर टिकाना। यह सब किस उद्देश्य से? 'आत्मविशुद्धये' — अपने अंतःकरण को निर्मल करने के लिए। योग यहाँ केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों के संयम द्वारा आत्मशुद्धि का मार्ग है।
आज के जीवन में: मन और इंद्रियों पर संयम रखकर किया गया कोई भी अभ्यास धीरे-धीरे भीतर की अशुद्धियों को दूर करता है।
श्लोक 6.13
वक्ता: श्रीकृष्ण
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥6.13॥
samaṁ kāya-śhiro-grīvaṁ dhārayann achalaṁ sthiraḥ / samprekṣhya nāsikāgraṁ svaṁ diśhaśh chānavalokayan
हिंदी अनुवाद: शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और अचल रखते हुए, इधर-उधर न देखकर, केवल अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाए हुए स्थिर होकर बैठे।
भावार्थ: यह श्लोक ध्यान के समय शरीर की सही स्थिति बताता है। 'समं कायशिरोग्रीवं' — काया, सिर और गर्दन एक सीध में, न आगे झुके न पीछे। 'अचलं स्थिरः' — शरीर हिले नहीं, स्थिर रहे। 'संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं' — दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर केंद्रित करना, जिससे आँखें बाहरी विषयों की ओर न भटकें। 'दिशश्चानवलोकयन्' — चारों दिशाओं में न देखना। यह सब मन को बाहर से खींचकर भीतर की ओर मोड़ने के उपाय हैं।
आज के जीवन में: ध्यान के समय शरीर को स्थिर और सीधा रखने से मन भी शीघ्र एकाग्र होता है।
श्लोक 6.14
वक्ता: श्रीकृष्ण
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥6.14॥
praśhāntātmā vigata-bhīr brahmachāri-vrate sthitaḥ / manaḥ sanyamya mach-chitto yukta āsīta mat-paraḥ
हिंदी अनुवाद: जिसका अंतःकरण शांत है, जो भयरहित है और जो ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित है, ऐसा सावधान योगी मन को संयमित करके मुझमें चित्त लगाते हुए मेरे परायण होकर बैठे।
भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण ध्यान के लिए आवश्यक आंतरिक गुण बताते हैं। 'प्रशान्तात्मा' — जिसका मन भीतर से शांत हो। 'विगतभीः' — जो भय से मुक्त हो, क्योंकि भय मन को अस्थिर करता है। 'ब्रह्मचारिव्रते स्थितः' — जो इंद्रियों के संयम के व्रत में दृढ़ हो। 'मच्चित्तः' और 'मत्परः' — मुझे (परमात्मा को) ही चित्त का केंद्र और परम लक्ष्य मानकर बैठे। यह श्लोक बताता है कि बाहरी आसन के साथ-साथ भीतरी शांति और समर्पण भी उतना ही आवश्यक है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति भय और विकारों से मुक्त होकर किसी उच्च लक्ष्य में मन लगाता है, उसका ध्यान और कार्य दोनों सफल होते हैं।
श्लोक 6.15
वक्ता: श्रीकृष्ण
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥6.15॥
yuñjann evaṁ sadātmānaṁ yogī niyata-mānasaḥ / śhantiṁ nirvāṇa-paramāṁ mat-sansthām adhigachchhati
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार मन को सदा परमात्मा में लगाने वाला, नियंत्रित मन वाला योगी उस परम शांति को प्राप्त होता है जो मुझमें स्थित है और जो मोक्ष में परिणत होती है।
भावार्थ: पूर्व श्लोकों में बताई गई विधि का फल यहाँ बताया गया है। 'नियतमानसः' — जिसका मन नियंत्रित और स्थिर है। 'युञ्जन्नेवं सदा' — इस प्रकार निरंतर अभ्यास करते हुए। 'निर्वाणपरमां शान्तिम्' — वह परम शांति जो मोक्ष में पूर्ण होती है। 'मत्संस्थाम्' — जो मुझ परमात्मा में प्रतिष्ठित है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि ध्यान-योग का अंतिम फल केवल मानसिक शांति नहीं, बल्कि परमात्मा में स्थिति और मुक्ति है।
आज के जीवन में: निरंतर और संयमित अभ्यास ही मनुष्य को गहरी, स्थायी शांति की ओर ले जाता है।
श्लोक 6.16
वक्ता: श्रीकृष्ण
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥6.16॥
nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ / na chāti-svapna-śhīlasya jāgrato naiva chārjuna
हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! यह योग न तो अधिक खाने वाले का सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का; और न अधिक सोने वाले का, न बिल्कुल न सोने वाले का।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक बात कहते हैं — योग की सिद्धि के लिए अति का त्याग आवश्यक है। अत्यधिक भोजन मन को आलसी और भारी बनाता है, जबकि बिल्कुल न खाने से शरीर दुर्बल होता है। इसी प्रकार अत्यधिक निद्रा तमस बढ़ाती है और बिल्कुल न सोने से शरीर और मन थक जाते हैं। दोनों ही स्थितियाँ ध्यान में बाधक हैं। यह श्लोक बताता है कि योग का मार्ग किसी भी प्रकार की अति से नहीं, बल्कि संतुलन से चलता है।
आज के जीवन में: किसी भी साधना या कार्य में अति — चाहे किसी भी दिशा में हो — सफलता की बाधा बनती है।
श्लोक 6.17
वक्ता: श्रीकृष्ण
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥6.17॥
yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu / yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā
हिंदी अनुवाद: दुखों का नाश करने वाला योग उसी का सिद्ध होता है जो आहार और विहार में, कर्मों में और निद्रा तथा जागरण में — सब में यथायोग्य संतुलन रखता है।
भावार्थ: पिछले श्लोक में 'क्या नहीं' बताया था, अब यहाँ 'क्या करना चाहिए' बताया जा रहा है। 'युक्ताहारविहारस्य' — जो खाने-पीने और भ्रमण आदि में संयमित हो। 'युक्तचेष्टस्य कर्मसु' — जो अपने कार्यों में उचित परिश्रम करे, न अधिक न कम। 'युक्तस्वप्नावबोधस्य' — जो सोने और जागने में भी संतुलन रखे। ऐसे संतुलित जीवन वाले साधक के लिए योग 'दुःखहा' — दुखों का नाशक — बन जाता है। यह संतुलन ही योग की नींव है।
आज के जीवन में: जीवन के हर पहलू में संतुलन बनाए रखना ही वह आधार है जिस पर किसी भी साधना की इमारत खड़ी होती है।
श्लोक 6.18
वक्ता: श्रीकृष्ण
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥6.18॥
yadā viniyataṁ chittam ātmanyevāvatiṣhṭhate / niḥspṛihaḥ sarva-kāmebhyo yukta ityuchyate tadā
हिंदी अनुवाद: जब वश में किया हुआ चित्त केवल अपने स्वरूप में ही स्थित हो जाता है और सभी विषयों की कामना से रहित हो जाता है, तब उस योगी को 'युक्त' — योग में स्थित — कहा जाता है।
भावार्थ: यह श्लोक योग की सिद्धि की पहचान बताता है। 'विनियतं चित्तम्' — भली-भाँति वश में किया हुआ चित्त। 'आत्मन्येवावतिष्ठते' — वह चित्त बाहर न भटककर केवल आत्मा में ही ठहर जाता है। 'निःस्पृहः सर्वकामेभ्यः' — सभी इच्छाओं और विषयों से पूर्णतः निःस्पृह हो जाता है, अर्थात् किसी भी बाहरी वस्तु की लालसा नहीं रहती। ऐसी अवस्था में साधक को 'युक्त' कहा जाता है — वह परमात्मा से जुड़ा हुआ है।
आज के जीवन में: जब मन किसी बाहरी वस्तु की चाह के बिना भीतर ही शांत और तृप्त रहने लगे, तो समझें कि साधना फल दे रही है।
श्लोक 6.19
वक्ता: श्रीकृष्ण
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥6.19॥
yathā dīpo nivāta-stho neṅgate sopamā smṛitā / yogino yata-chittasya yuñjato yogam ātmanaḥ
हिंदी अनुवाद: जैसे वायुरहित स्थान में रखा दीपक बिल्कुल नहीं काँपता, वैसी ही उपमा उस योगी के वश में किए हुए चित्त की दी गई है जो आत्मा में योग का अभ्यास करता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक सुंदर उपमा देते हैं। 'निवातस्थः दीपः' — वायुरहित स्थान में रखा दीपक — उसकी लौ स्थिर रहती है, इधर-उधर नहीं हिलती। ठीक इसी प्रकार जो योगी अपने चित्त को वश में करके आत्मा में योग का अभ्यास करता है, उसका चित्त भी बाहरी विषयों की हवा से विचलित नहीं होता — वह स्थिर, शांत और एकाग्र रहता है। यह उपमा ध्यान की उस अवस्था को चित्रित करती है जहाँ मन पूर्णतः निश्चल हो जाता है।
आज के जीवन में: जिस प्रकार हवा न हो तो दीपक स्थिर रहता है, उसी प्रकार विषयों की चाह न हो तो मन भी स्थिर रहता है।
श्लोक 6.20
वक्ता: श्रीकृष्ण
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥6.20॥
yatroparamate chittaṁ niruddhaṁ yoga-sevayā / yatra chaivātmanātmānaṁ paśhyann ātmani tuṣhyati
हिंदी अनुवाद: योग के अभ्यास से जब निरुद्ध चित्त शांत हो जाता है, और जब साधक स्वयं अपने आप से अपने आप को देखता हुआ अपने भीतर ही संतुष्ट हो जाता है।
भावार्थ: यह श्लोक समाधि की अवस्था का वर्णन आरंभ करता है। 'योगसेवया निरुद्धं चित्तम्' — योग के अभ्यास से जो चित्त पूरी तरह रुक जाता है, वह 'उपरमते' — विश्राम पाता है, शांत हो जाता है। 'आत्मनाऽऽत्मानं पश्यन्' — साधक स्वयं अपनी आत्मा से अपनी आत्मा को देखता है — यहाँ कोई बाहरी माध्यम नहीं, कोई विषय नहीं। 'आत्मनि तुष्यति' — वह अपने भीतर ही पूर्णतः संतुष्ट हो जाता है। यह वह अवस्था है जहाँ बाहरी संसार से कुछ भी पाने की आवश्यकता नहीं रहती।
आज के जीवन में: जब मनुष्य अपने भीतर ही पूर्ण तृप्ति अनुभव करने लगे, तो वह सच्चे अर्थों में स्वतंत्र है।
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