भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 21–30 | आत्मसंयमयोग | अर्थ सहित
अध्याय ६ में श्रीकृष्ण अर्जुन को ध्यानयोग की विधि समझा रहे हैं। पहले वे योगी के आसन, आहार और दिनचर्या का वर्णन कर चुके हैं। इस खंड में वे उस परम सुख का स्वरूप बताते हैं जो ध्यान की सिद्धि से मिलता है, और अंत में उस दृष्टि का वर्णन करते हैं जिसमें योगी सबमें आत्मा को और सबमें ईश्वर को देखता है।
श्लोक 6.21
वक्ता: श्रीकृष्ण
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥6.21॥
sukham ātyantikaṁ yat tad buddhi-grāhyam atīndriyam / vetti yatra na chaivāyaṁ sthitaśh chalati tattvataḥ
हिंदी अनुवाद: जो सुख अत्यंत गहरा, इन्द्रियों से परे और केवल शुद्ध बुद्धि द्वारा अनुभव किया जा सकता है — उस सुख को जिस अवस्था में योगी अनुभव करता है, उसमें स्थित होकर वह फिर कभी सत्य से विचलित नहीं होता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ ध्यानयोग की उस चरम अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जहाँ साधक को एक विशेष सुख का अनुभव होता है। इस सुख की तीन विशेषताएँ बताई गई हैं — यह 'आत्यन्तिक' अर्थात् असीम है, 'अतीन्द्रिय' अर्थात् इन्द्रियों की पहुँच से परे है, और 'बुद्धिग्राह्य' अर्थात् शुद्ध अंतःकरण द्वारा ही अनुभव में आता है। जो इस सुख को एक बार पा लेता है, वह 'तत्त्वतः' — अर्थात् वास्तविकता की दृष्टि से — फिर कभी डिगता नहीं।
आज के जीवन में: जो सुख भीतर से मिलता है, वह बाहरी परिस्थितियों के बदलने पर भी टिका रहता है।
श्लोक 6.22
वक्ता: श्रीकृष्ण
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥6.22॥
yaṁ labdhvā chāparaṁ lābhaṁ manyate nādhikaṁ tataḥ / yasmin sthito na duḥkhena guruṇāpi vichālyate
हिंदी अनुवाद: जिस लाभ को पाने के बाद उससे बड़ा कोई और लाभ संभव नहीं लगता, और जिसमें स्थित होने पर भारी से भारी दुःख भी उसे विचलित नहीं कर सकता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण उसी परम सुख का आगे वर्णन करते हैं। इस अवस्था की दो पहचान बताई गई हैं — पहली, इससे बड़ा कोई लाभ मनुष्य की कल्पना में भी नहीं आता; दूसरी, इसमें स्थित होने पर 'गुरु दुःख' अर्थात् बड़े से बड़ा कष्ट भी साधक को उसकी स्थिति से नहीं हिला सकता। यह श्लोक पिछले श्लोक की अनुभूति का व्यावहारिक प्रमाण देता है — जो भीतर से पूर्ण है, उसे बाहर से कुछ खोने का भय नहीं रहता।
आज के जीवन में: जब भीतर की शांति दृढ़ हो जाती है, तो बाहरी कठिनाइयाँ उसे तोड़ नहीं पातीं।
श्लोक 6.23
वक्ता: श्रीकृष्ण
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥6.23॥
taṁ vidyād duḥkha-sanyoga-viyogaṁ yogasaṅjñitam / sa niśhchayena yoktavyo yogo ’nirviṇṇa-chetasā
हिंदी अनुवाद: दुःखों के संयोग से सर्वथा वियोग हो जाना — इसी को 'योग' जानना चाहिए। इस योग का अभ्यास बिना उकताए, दृढ़ निश्चय के साथ करना चाहिए।
भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण 'योग' की एक सुंदर परिभाषा देते हैं — योग वह अवस्था है जिसमें दुःखों का संयोग सदा के लिए टूट जाता है। 'दुःखसंयोगवियोग' — दुःख से जो जुड़ाव है उसका पूर्ण विच्छेद — यही योग का सार है। साथ ही वे साधना का ढंग भी बताते हैं: 'निश्चयेन' अर्थात् दृढ़ संकल्प से, और 'अनिर्विण्णचेतसा' अर्थात् ऊबे या निराश हुए बिना। योग कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं, निरंतर और धैर्यपूर्ण अभ्यास की माँग करता है।
आज के जीवन में: जो कार्य भीतरी शांति की ओर ले जाए, उसे धैर्य और दृढ़ता से करते रहना चाहिए।
श्लोक 6.24
वक्ता: श्रीकृष्ण
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥6.24॥
saṅkalpa-prabhavān kāmāns tyaktvā sarvān aśheṣhataḥ / manasaivendriya-grāmaṁ viniyamya samantataḥ
हिंदी अनुवाद: संकल्प से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूरी तरह त्यागकर और मन के द्वारा ही इन्द्रियों के समूह को सब ओर से रोककर।
भावार्थ: यह श्लोक ध्यान की व्यावहारिक विधि का पहला चरण बताता है। 'संकल्पप्रभवान् कामान्' — संकल्प अर्थात् मन की कल्पना और इच्छा से जन्मी कामनाएँ — इन्हें 'अशेषतः' यानी बिना कुछ शेष छोड़े त्यागना है। दूसरी बात यह है कि इन्द्रियों को बाहर से नहीं, मन के द्वारा ही वश में करना है — क्योंकि इन्द्रियाँ मन के इशारे पर चलती हैं। जब मन की इच्छाएँ शांत होती हैं, इन्द्रियाँ स्वयं शांत हो जाती हैं।
आज के जीवन में: इन्द्रियों को बाहर से दबाने से नहीं, मन की कामनाओं को भीतर से शांत करने से संयम सधता है।
श्लोक 6.25
वक्ता: श्रीकृष्ण
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥6.25॥
śhanaiḥ śhanair uparamed buddhyā dhṛiti-gṛihītayā / ātma-sansthaṁ manaḥ kṛitvā na kiñchid api chintayet
हिंदी अनुवाद: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे संसार से उपराम हो जाए और मन को परमात्मा में भली-भाँति स्थापित करके फिर कुछ भी न सोचे।
भावार्थ: यह श्लोक ध्यान की विधि का दूसरा चरण है। 'शनैः शनैः' — धीरे-धीरे — यह शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण है; योग में जल्दबाजी नहीं चलती। 'धृतिगृहीतया बुद्ध्या' अर्थात् धैर्य से थामी हुई बुद्धि के सहारे मन को संसार के विषयों से हटाना है। 'आत्मसंस्थं मनः कृत्वा' — मन को आत्मा या परमात्मा में स्थिर करके — फिर किसी अन्य विषय का चिंतन नहीं करना। यह एकाग्रता की पराकाष्ठा है।
आज के जीवन में: मन को एकाग्र करना एक क्रमिक अभ्यास है — धैर्य के साथ, बिना हड़बड़ी के।
श्लोक 6.26
वक्ता: श्रीकृष्ण
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥6.26॥
yato yato niśhcharati manaśh chañchalam asthiram / tatas tato niyamyaitad ātmanyeva vaśhaṁ nayet
हिंदी अनुवाद: यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटकता है, वहाँ-वहाँ से उसे हटाकर बार-बार परमात्मा में ही लगाए।
भावार्थ: ध्यान के अभ्यास में सबसे बड़ी बाधा मन की चंचलता है। श्रीकृष्ण यहाँ इसका व्यावहारिक समाधान देते हैं — जब भी मन भटके, उसे वहाँ से खींचकर वापस परमात्मा में लगाओ। 'यतो यतो निश्चरति' — जिस-जिस दिशा में मन जाए — 'ततस्ततो नियम्य' — उस-उस दिशा से रोककर। यह प्रक्रिया बार-बार करनी होती है; निराश होने की आवश्यकता नहीं। मन का भटकना स्वाभाविक है, उसे वापस लाना साधना है।
आज के जीवन में: मन का बार-बार भटकना साधना की विफलता नहीं है; उसे बार-बार वापस लाना ही साधना है।
श्लोक 6.27
वक्ता: श्रीकृष्ण
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥6.27॥
praśhānta-manasaṁ hyenaṁ yoginaṁ sukham uttamam / upaiti śhānta-rajasaṁ brahma-bhūtam akalmaṣham
हिंदी अनुवाद: जिसके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिसका रजोगुण और मन पूरी तरह शांत हो गए हैं, ऐसे ब्रह्मस्वरूप योगी को निश्चित ही उत्तम सुख प्राप्त होता है।
भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण उस योगी का चित्र खींचते हैं जिसने ध्यान की सिद्धि पा ली है। उसकी चार विशेषताएँ बताई गई हैं — 'प्रशान्तमनस' अर्थात् मन पूर्णतः शांत, 'शान्तरजस' अर्थात् रजोगुण की उत्तेजना समाप्त, 'अकल्मष' अर्थात् पापरहित, और 'ब्रह्मभूत' अर्थात् ब्रह्म के साथ एकरूप। ऐसे योगी को 'सुखमुत्तमम्' — उत्तम सुख — स्वयं आकर मिलता है, उसे उसके लिए भटकना नहीं पड़ता।
आज के जीवन में: जब मन की उत्तेजना और भीतर का मैल दूर होता है, तब परम शांति स्वयं प्रकट होती है।
श्लोक 6.28
वक्ता: श्रीकृष्ण
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥6.28॥
yuñjann evaṁ sadātmānaṁ yogī vigata-kalmaṣhaḥ / sukhena brahma-sansparśham atyantaṁ sukham aśhnute
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार अपने आप को सदा परमात्मा में लगाता हुआ पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्म के स्पर्श रूप अत्यंत सुख को प्राप्त होता है।
भावार्थ: पिछले श्लोक में जो योगी का स्वरूप बताया गया, उसकी उपलब्धि यहाँ बताई जा रही है। 'युञ्जन् एवं सदा' — इस प्रकार सदा अभ्यास करते हुए — 'विगतकल्मष' अर्थात् पापों से मुक्त योगी 'ब्रह्मसंस्पर्श' को पाता है — ब्रह्म का स्पर्श, ब्रह्म से मिलन। यह सुख 'सुखेन' अर्थात् सहज और सुखपूर्वक मिलता है — जबरदस्ती नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास की स्वाभाविक परिणति के रूप में।
आज के जीवन में: निरंतर और निष्ठापूर्ण अभ्यास से परम शांति की प्राप्ति सहज हो जाती है।
श्लोक 6.29
वक्ता: श्रीकृष्ण
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥6.29॥
sarva-bhūta-stham ātmānaṁ sarva-bhūtāni chātmani / īkṣhate yoga-yuktātmā sarvatra sama-darśhanaḥ
हिंदी अनुवाद: ध्यानयोग से युक्त अंतःकरण वाला और सब जगह समान दृष्टि रखने वाला योगी अपनी आत्मा को सम्पूर्ण प्राणियों में और सम्पूर्ण प्राणियों को अपनी आत्मा में देखता है।
भावार्थ: यह श्लोक योग की उस परिपक्व अवस्था का वर्णन करता है जिसे 'समदर्शन' कहते हैं — सब में समान देखना। 'योगयुक्तात्मा' — जिसका अंतःकरण योग में स्थित है — वह 'सर्वभूतस्थमात्मानम्' अर्थात् सब प्राणियों में अपनी आत्मा को देखता है, और 'सर्वभूतानि चात्मनि' अर्थात् सब प्राणियों को अपनी आत्मा में देखता है। यह दोनों दृष्टियाँ एक ही सत्य के दो पहलू हैं — आत्मा सर्वव्यापी है।
आज के जीवन में: जो अपने भीतर की आत्मा को पहचान लेता है, वह दूसरों में भी उसी को देखने लगता है।
श्लोक 6.30
वक्ता: श्रीकृष्ण
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥6.30॥
yo māṁ paśhyati sarvatra sarvaṁ cha mayi paśhyati / tasyāhaṁ na praṇaśhyāmi sa cha me na praṇaśhyati
हिंदी अनुवाद: जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण पिछले श्लोक की आत्मदृष्टि को अब अपने साथ जोड़ते हैं। जो योगी सब प्राणियों में ईश्वर को और सब में ईश्वर को देखता है — उसके और ईश्वर के बीच कभी विच्छेद नहीं होता। 'न प्रणश्यामि' — मैं उसके लिए ओझल नहीं होता — और 'स च मे न प्रणश्यति' — वह मेरे लिए ओझल नहीं होता। यह परस्पर अदृश्यता का अभाव ही उस अटूट संबंध का प्रमाण है जो समदर्शन से उत्पन्न होता है।
आज के जीवन में: जो ईश्वर को सब में देखता है, उसका ईश्वर से संबंध कभी नहीं टूटता।
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