भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 31–40 | आत्मसंयमयोग | अर्थ सहित
अध्याय छह में श्रीकृष्ण ने ध्यानयोग की विधि, मन के संयम और समभाव की महिमा बताई है। इस खंड में पहले श्रीकृष्ण समभाव में स्थित श्रेष्ठ योगी का लक्षण बताते हैं, फिर अर्जुन मन की चंचलता को लेकर अपनी कठिनाई प्रकट करते हैं और यह भी पूछते हैं कि यदि साधक बीच में ही योग से विचलित हो जाए तो उसकी क्या गति होती है — जिसका उत्तर श्रीकृष्ण आश्वासन देते हुए देते हैं।
श्लोक 6.31
वक्ता: श्रीकृष्ण
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥6.31॥
sarva-bhūta-sthitaṁ yo māṁ bhajatyekatvam āsthitaḥ / sarvathā vartamāno ’pi sa yogī mayi vartate
हिंदी अनुवाद: जो योगी मेरे साथ एकत्व में स्थित होकर, समस्त प्राणियों में विद्यमान मेरा भजन करता है, वह जो भी व्यवहार करे — वह सदा मुझमें ही स्थित रहता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि सच्चा भक्त-योगी वह है जो यह जानता है कि परमात्मा सभी प्राणियों में एक समान विद्यमान है। 'एकत्वमास्थितः' का अर्थ है — इस एकत्व-भाव में दृढ़ता से टिका हुआ। ऐसा योगी चाहे किसी भी परिस्थिति में हो, उसके सभी कार्य परमात्मा की ओर ही उन्मुख रहते हैं। उसके लिए सांसारिक व्यवहार और ईश्वर-भक्ति में कोई भेद नहीं रहता।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति सभी प्राणियों में ईश्वर को देखता है, उसके लिए प्रत्येक कार्य एक प्रकार की उपासना बन जाता है।
श्लोक 6.32
वक्ता: श्रीकृष्ण
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः ॥6.32॥
ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśhyati yo ’rjuna / sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ
हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! जो योगी अपने समान ही सर्वत्र समान दृष्टि रखता है और सुख तथा दुःख को भी समान देखता है, वह परम योगी माना गया है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ सर्वश्रेष्ठ योगी का लक्षण बता रहे हैं। 'आत्मौपम्येन' का अर्थ है — जैसे अपने आप को सुख-दुःख होता है, वैसे ही दूसरों को भी होता है — यह समझकर सबको समान दृष्टि से देखना। जो साधक इस समभाव को सिद्ध कर लेता है — जो न किसी के सुख से अत्यधिक प्रसन्न होता है, न किसी के दुःख से विचलित — वही परम योगी है।
आज के जीवन में: दूसरों के सुख-दुःख को अपने समान समझने की भावना ही सच्ची करुणा और योग की पराकाष्ठा है।
श्लोक 6.33
वक्ता: अर्जुन
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम् ॥6.33॥
arjuna uvācha / yo ’yaṁ yogas tvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana / etasyāhaṁ na paśhyāmi chañchalatvāt sthitiṁ sthirām
हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे मधुसूदन! आपने जो यह समतापूर्ण योग बताया है, मन की चंचलता के कारण मैं इसकी स्थिर स्थिति नहीं देख पाता।
भावार्थ: अर्जुन श्रीकृष्ण के उपदेश को सुनकर अपनी व्यावहारिक कठिनाई सामने रखते हैं। वे 'मधुसूदन' संबोधन से कृष्ण को पुकारते हैं। उनका कहना है कि समभाव और ध्यान का यह मार्ग सुनने में तो उत्तम लगता है, किंतु मन इतना चंचल है कि इस योग में स्थिर रह पाना संभव नहीं दिखता। यह प्रश्न अर्जुन की ईमानदारी और जिज्ञासा को दर्शाता है।
आज के जीवन में: साधना में आने वाली कठिनाइयों को खुलकर स्वीकार करना और गुरु से पूछना — यही सीखने का सच्चा मार्ग है।
श्लोक 6.34
वक्ता: अर्जुन
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥6.34॥
chañchalaṁ hi manaḥ kṛiṣhṇa pramāthi balavad dṛiḍham / tasyāhaṁ nigrahaṁ manye vāyor iva su-duṣhkaram
हिंदी अनुवाद: हे कृष्ण! मन अत्यंत चंचल, उद्वेलित करने वाला, दृढ़ और बलवान है। मैं इसे वश में करना वायु को रोकने जितना कठिन मानता हूँ।
भावार्थ: अर्जुन मन की चार विशेषताएँ गिनाते हैं — चंचल, प्रमथनशील (मन को मथ डालने वाला), दृढ़ (जिद्दी स्वभाव का) और बलवान। 'निग्रह' का अर्थ है — वश में करना, रोकना। अर्जुन वायु का उदाहरण देते हैं — जैसे हवा को मुट्ठी में बंद नहीं किया जा सकता, वैसे ही मन को भी नहीं। यह उनकी सच्ची व्यथा है जो हर साधक के मन में उठती है।
आज के जीवन में: मन की चंचलता को पहचानना ही उसे साधने की दिशा में पहला कदम है।
श्लोक 6.35
वक्ता: श्रीकृष्ण
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥6.35॥
śhrī bhagavān uvācha / asanśhayaṁ mahā-bāho mano durnigrahaṁ chalam / abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa cha gṛihyate
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है — यह तुमने ठीक कहा। परंतु हे कुंतीनंदन! अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन की बात को 'असंशयम्' — निःसंदेह — कहकर स्वीकार करते हैं। वे उसे निराश नहीं करते, बल्कि दो उपाय बताते हैं — 'अभ्यास' अर्थात् बार-बार मन को साधना में लगाना, और 'वैराग्य' अर्थात् विषयों के प्रति आसक्ति छोड़ना। ये दोनों मिलकर मन को धीरे-धीरे स्थिर करते हैं। 'महाबाहो' और 'कौन्तेय' संबोधन से कृष्ण अर्जुन में उत्साह भरते हैं।
आज के जीवन में: मन को साधने के लिए निरंतर अभ्यास और विषयों से विरक्ति — ये दोनों मिलकर काम करते हैं।
श्लोक 6.36
वक्ता: श्रीकृष्ण
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥6.36॥
asaṅyatātmanā yogo duṣhprāpa iti me matiḥ / vaśhyātmanā tu yatatā śhakyo ’vāptum upāyataḥ
हिंदी अनुवाद: जिसका मन वश में नहीं है, उसके लिए योग प्राप्त करना कठिन है — यह मेरा मत है। किंतु जो उचित उपाय से प्रयत्न करता है और जिसका मन वश में है, वह योग प्राप्त कर सकता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि योग की प्राप्ति असंभव नहीं, किंतु उसके लिए मन का वश में होना आवश्यक है। 'वश्यात्मना' का अर्थ है — जिसने अपने मन को अपने अधीन कर लिया हो। 'उपायतः' का अर्थ है — उचित साधन और विधि से। अर्थात् केवल इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि सही मार्ग पर चलते हुए प्रयत्न करने से योग सिद्ध होता है।
आज के जीवन में: सही विधि और दृढ़ प्रयास से मन को साधा जा सकता है — यह विश्वास ही साधना की नींव है।
श्लोक 6.37
वक्ता: अर्जुन
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥6.37॥
arjuna uvācha / ayatiḥ śhraddhayopeto yogāch chalita-mānasaḥ / aprāpya yoga-sansiddhiṁ kāṅ gatiṁ kṛiṣhṇa gachchhati
हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे कृष्ण! जिसमें श्रद्धा तो है किंतु प्रयत्न शिथिल है, और जो अंत समय में योग से विचलित हो जाता है — वह योगसिद्धि न पाकर किस गति को प्राप्त होता है?
भावार्थ: अर्जुन एक गहरी आशंका व्यक्त करते हैं। 'अयतिः' का अर्थ है — जिसका प्रयत्न पर्याप्त नहीं रहा। ऐसा साधक जो श्रद्धावान तो है, पर साधना पूरी नहीं कर पाया और अंत में मन भटक गया — वह न पूरी तरह सांसारिक रहा, न योगसिद्ध हुआ। अर्जुन जानना चाहते हैं कि क्या ऐसे अधूरे साधक का सब कुछ व्यर्थ हो जाता है?
आज के जीवन में: साधना में श्रद्धा के साथ-साथ निरंतर प्रयत्न भी आवश्यक है — यह प्रश्न इसी सत्य की ओर संकेत करता है।
श्लोक 6.38
वक्ता: अर्जुन
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥6.38॥
kachchin nobhaya-vibhraṣhṭaśh chhinnābhram iva naśhyati / apratiṣhṭho mahā-bāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi
हिंदी अनुवाद: हे महाबाहो! क्या वह दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ साधक — जो न संसार में टिका, न परमात्मा के मार्ग पर — छिन्न-भिन्न बादल की तरह नष्ट हो जाता है?
भावार्थ: अर्जुन अपनी आशंका को और स्पष्ट करते हैं। 'छिन्नाभ्रम्' अर्थात् टुकड़ों में बिखरा बादल — जो न पूरी तरह बरसा, न आकाश में टिका — यह उपमा बहुत सटीक है। 'अप्रतिष्ठः' का अर्थ है — जिसका कोई आधार न रहा। 'ब्रह्मणः पथि' अर्थात् परमात्मा के मार्ग पर। अर्जुन पूछते हैं कि क्या ऐसा साधक दोनों लोकों में भटककर नष्ट हो जाता है?
श्लोक 6.39
वक्ता: अर्जुन
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥6.39॥
etan me sanśhayaṁ kṛiṣhṇa chhettum arhasyaśheṣhataḥ / tvad-anyaḥ sanśhayasyāsya chhettā na hyupapadyate
हिंदी अनुवाद: हे कृष्ण! मेरे इस संशय को पूरी तरह दूर करने में आप ही समर्थ हैं, क्योंकि आपके अतिरिक्त इस संशय को काटने वाला और कोई नहीं हो सकता।
भावार्थ: अर्जुन अपना प्रश्न पूरा करते हुए श्रीकृष्ण पर पूर्ण विश्वास व्यक्त करते हैं। 'छेत्तुम्' का अर्थ है — काटना, दूर करना। वे कहते हैं कि यह संशय इतना गहरा है कि केवल श्रीकृष्ण ही इसे पूरी तरह मिटा सकते हैं। यह वाक्य अर्जुन की विनम्रता और श्रीकृष्ण के प्रति उनकी अटूट आस्था को दर्शाता है।
आज के जीवन में: जब मन में गहरा संशय हो, तो विश्वासपात्र ज्ञानी के पास जाकर उसे खुलकर पूछना चाहिए।
श्लोक 6.40
वक्ता: श्रीकृष्ण
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
नहि कल्याणकृत्कश्िचद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥6.40॥
śhrī bhagavān uvācha / pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate / na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — हे पृथानंदन! उस साधक का न इस लोक में, न परलोक में विनाश होता है; क्योंकि हे प्रिय! भला कार्य करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं। 'कल्याणकृत्' का अर्थ है — जो शुभ और भले कार्य करता है। 'दुर्गतिम्' अर्थात् बुरी दशा या पतन। कृष्ण 'तात' — प्रिय पुत्र जैसे — संबोधन से स्नेहपूर्वक कहते हैं कि जिसने श्रद्धा और भले आचरण के साथ साधना की, उसका कभी नाश नहीं होता। अधूरी साधना भी व्यर्थ नहीं जाती।
आज के जीवन में: जो भी भले मन से साधना और सत्कर्म में लगा है, उसका प्रयास कभी निष्फल नहीं होता।
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