भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 41–47 | आत्मसंयमयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·5 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 41–47 | आत्मसंयमयोग | अर्थ सहित

अध्याय छह में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ध्यानयोग का विस्तृत मार्ग समझाया। पिछले खंड में उन्होंने योगभ्रष्ट की गति का प्रश्न उठाया था। इस अंतिम खंड में वे उस प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते हैं कि योगभ्रष्ट का पतन नहीं होता — वह अनेक जन्मों में धीरे-धीरे परमगति को प्राप्त होता है। अंत में वे योगी की श्रेष्ठता और भक्तियुक्त योगी को सर्वोच्च बताकर अध्याय का समापन करते हैं।

श्लोक 6.41

वक्ता: श्रीकृष्ण

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥6.41॥

prāpya puṇya-kṛitāṁ lokān uṣhitvā śhāśhvatīḥ samāḥ / śhuchīnāṁ śhrīmatāṁ gehe yoga-bhraṣhṭo’bhijāyate

हिंदी अनुवाद: योगभ्रष्ट पुण्यकर्मियों के लोकों को प्राप्त होकर वहाँ बहुत वर्षों तक निवास करता है, और फिर इस पृथ्वी पर शुद्ध एवं समृद्ध कुल में जन्म लेता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि जो साधक योग के मार्ग पर चलते हुए बीच में रुक जाता है, उसका सर्वनाश नहीं होता। 'पुण्यकृतां लोकान्' अर्थात् पुण्यात्माओं के उच्च लोकों में वह चिरकाल तक रहता है। वहाँ का भोग समाप्त होने पर वह 'शुचीनां श्रीमतां गेहे' — अर्थात् पवित्र और संपन्न परिवार में — जन्म लेता है, जहाँ उसे साधना के अनुकूल वातावरण मिलता है।

आज के जीवन में: अच्छे प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाते; आज का सत्कर्म आगे के जीवन की नींव बनता है।


श्लोक 6.42

वक्ता: श्रीकृष्ण

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥6.42॥

atha vā yoginām eva kule bhavati dhīmatām / etad dhi durlabhataraṁ loke janma yad īdṛiśham

हिंदी अनुवाद: अथवा वैराग्यवान् योगभ्रष्ट ज्ञानी योगियों के कुल में ही जन्म लेता है; ऐसा जन्म इस संसार में अत्यंत दुर्लभ है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ दूसरी और अधिक श्रेष्ठ संभावना बताते हैं। जिस योगभ्रष्ट में वैराग्य अधिक था, वह 'धीमतां योगिनाम् कुले' — बुद्धिमान योगियों के परिवार में — जन्म लेता है। ऐसे कुल में जन्म से ही साधना का संस्कार, वातावरण और मार्गदर्शन सहज उपलब्ध होता है। श्रीकृष्ण इसे 'दुर्लभतरम्' — अत्यंत दुर्लभ — कहते हैं, जो इस जन्म के मूल्य को रेखांकित करता है।

आज के जीवन में: साधना का परिवेश और संगति जीवन की दिशा को गहराई से प्रभावित करते हैं।


श्लोक 6.43

वक्ता: श्रीकृष्ण

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥6.43॥

tatra taṁ buddhi-sanyogaṁ labhate paurva-dehikam / yatate cha tato bhūyaḥ sansiddhau kuru-nandana

हिंदी अनुवाद: हे कुरुनन्दन! वहाँ उसे पूर्वजन्म की साधन-सम्पत्ति स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाती है और वह पुनः पूर्ण सिद्धि के लिए विशेष प्रयत्न करता है।

भावार्थ: 'बुद्धिसंयोगं पौर्वदेहिकम्' का अर्थ है — पूर्व शरीर में अर्जित की गई बुद्धि और साधना का संस्कार। यह संस्कार नए जन्म में स्वतः जागृत हो जाता है, इसलिए उसे नए सिरे से आरंभ नहीं करना पड़ता। वह वहीं से आगे बढ़ता है जहाँ पिछले जन्म में रुका था। 'संसिद्धौ यतते भूयः' — वह पुनः पूर्ण सिद्धि के लिए और अधिक उत्साह से प्रयत्न करता है।

आज के जीवन में: साधना में लगाया गया प्रत्येक प्रयास संचित होता रहता है और आगे काम आता है।


श्लोक 6.44

वक्ता: श्रीकृष्ण

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥6.44॥

pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśho ’pi saḥ / jijñāsur api yogasya śhabda-brahmātivartate

हिंदी अनुवाद: वह भोगों के वश में होते हुए भी पूर्वजन्म के अभ्यास के कारण परमात्मा की ओर खिंचता चला जाता है; क्योंकि योग का जिज्ञासु भी वेदों में कहे सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर जाता है।

भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण उस योगभ्रष्ट की बात करते हैं जो संपन्न कुल में जन्मा है और भोगों के बीच है। फिर भी 'पूर्वाभ्यासेन' — पूर्वजन्म के अभ्यास के बल पर — वह अनायास ही आध्यात्मिक मार्ग की ओर आकृष्ट होता है। 'शब्दब्रह्म' का अर्थ है वेदों में वर्णित सकाम कर्मकांड। योग का केवल जिज्ञासु भी उससे ऊपर उठ जाता है — यह पूर्व संस्कार की महान शक्ति है।

आज के जीवन में: आध्यात्मिक जिज्ञासा भी मनुष्य को सांसारिक आसक्ति से ऊपर उठाने की शक्ति रखती है।


श्लोक 6.45

वक्ता: श्रीकृष्ण

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥6.45॥

prayatnād yatamānas tu yogī sanśhuddha-kilbiṣhaḥ / aneka-janma-sansiddhas tato yāti parāṁ gatim

हिंदी अनुवाद: परंतु जो योगी प्रयत्नपूर्वक साधना करता है, जिसके दोष नष्ट हो गए हैं और जो अनेक जन्मों से सिद्ध होता आया है, वह परमगति को प्राप्त कर लेता है।

भावार्थ: 'संशुद्धकिल्बिषः' का अर्थ है जिसके सभी दोष और अशुद्धियाँ दूर हो गई हैं। 'अनेकजन्मसंसिद्धः' — अनेक जन्मों में धीरे-धीरे परिपक्व हुआ। श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि यह यात्रा एक जन्म की नहीं है; अनेक जन्मों के निरंतर प्रयत्न और शुद्धि के बाद योगी 'परां गतिम्' — सर्वोच्च गति — को प्राप्त होता है। यह उत्साहवर्धक संदेश है कि अंत में सफलता निश्चित है।

आज के जीवन में: निरंतर प्रयत्न और आत्मशुद्धि से मनुष्य अपने जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करता है।


श्लोक 6.46

वक्ता: श्रीकृष्ण

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥6.46॥

tapasvibhyo ’dhiko yogī / jñānibhyo ’pi mato ’dhikaḥ / karmibhyaśh chādhiko yogī / tasmād yogī bhavārjuna

हिंदी अनुवाद: योगी तपस्वियों से भी श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है और सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है — यह मेरा मत है। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी हो।

भावार्थ: श्रीकृष्ण तीन प्रकार के साधकों से योगी की तुलना करते हैं — तपस्वी, शास्त्रज्ञानी और सकाम कर्मी। 'मतः' — यह मेरा स्वयं का मत है, ऐसा कहकर वे इस निष्कर्ष को विशेष बल देते हैं। योगी इन सबसे इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि वह बाहरी साधनों से नहीं, भीतर की समता और एकाग्रता से परमात्मा की ओर बढ़ता है। अंत में वे अर्जुन को सीधे आदेश देते हैं — 'योगी भव'।

आज के जीवन में: केवल बाहरी कर्मकांड या ज्ञान नहीं, भीतरी समता और एकाग्रता ही जीवन को सच्ची ऊँचाई देती है।


श्लोक 6.47

वक्ता: श्रीकृष्ण

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥6.47॥

yoginām api sarveṣhāṁ mad-gatenāntar-ātmanā / śhraddhāvān bhajate yo māṁ sa me yuktatamo mataḥ

हिंदी अनुवाद: सभी योगियों में भी जो श्रद्धावान् भक्त अपने अंतःकरण को मुझमें लीन करके मेरा भजन करता है, वह मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी है।

भावार्थ: 'मद्गतेन अन्तरात्मना' — जिसका अंतरात्मा पूरी तरह मुझमें समाया हुआ है। 'श्रद्धावान्' — जो श्रद्धा से भरा है। श्रीकृष्ण अध्याय के अंत में यह उद्घोषणा करते हैं कि योगियों में भी सर्वोच्च वह है जो भक्तिभाव से उनका भजन करता है। इस प्रकार ध्यानयोग का यह अध्याय भक्तियोग की श्रेष्ठता पर समाप्त होता है — योग और भक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं।

आज के जीवन में: श्रद्धा और प्रेम से की गई उपासना ही सभी साधनाओं में सर्वोच्च है।


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