भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 7, श्लोक 11–20 | ज्ञानविज्ञानयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·9 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 7, श्लोक 11–20 | ज्ञानविज्ञानयोग | अर्थ सहित

अध्याय सात के पहले भाग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि वे ही इस सृष्टि की अपरा और परा प्रकृति हैं, और जल, प्रकाश, ध्वनि आदि में उनकी ही सत्ता है। इस दूसरे खंड में वे आगे स्पष्ट करते हैं कि तीनों गुणों से उत्पन्न समस्त भाव उन्हीं से हैं, फिर भी वे उनसे परे हैं; माया की दुर्लंघ्यता और उससे पार होने का उपाय बताते हैं; और चार प्रकार के भक्तों का वर्णन करते हुए ज्ञानी भक्त की सर्वोच्चता समझाते हैं।

श्लोक 7.11

वक्ता: श्रीकृष्ण

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥7.11॥

balaṁ balavatāṁ chāhaṁ kāma-rāga-vivarjitam / dharmāviruddho bhūteṣhu kāmo ’smi bharatarṣhabha

हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! बलवानों का वह बल जो काम और राग से रहित है, वह मैं हूँ। प्राणियों में जो कामना धर्म के विरुद्ध नहीं है, वह भी मैं हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि संसार की प्रत्येक शक्ति में उनकी ही उपस्थिति है। बल दो प्रकार का होता है — एक जो अहंकार, लालसा और आसक्ति से जुड़ा है, और दूसरा जो निर्मल और निःस्वार्थ है। वह निर्मल बल ईश्वर का ही रूप है। इसी प्रकार 'काम' अर्थात् इच्छा भी यदि धर्म की सीमा में हो — किसी को हानि न पहुँचाए, न्यायसंगत हो — तो वह भी परमात्मा का ही अंश है। 'कामरागविवर्जितम्' का अर्थ है काम और राग से रहित।

आज के जीवन में: जो शक्ति हम सत्कार्य के लिए लगाते हैं और जो इच्छाएँ धर्म की सीमा में हैं, वे ईश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं — यह भाव मन को निर्मल रखता है।


श्लोक 7.12

वक्ता: श्रीकृष्ण

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि नत्वहं तेषु ते मयि ॥7.12॥

ye chaiva sāttvikā bhāvā rājasās tāmasāśh cha ye / matta eveti tān viddhi na tvahaṁ teṣhu te mayi

हिंदी अनुवाद: जितने भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भाव हैं, वे सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं — ऐसा जानो। परंतु मैं उनमें नहीं हूँ और वे मुझमें नहीं हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण तीनों गुणों — सत्त्व (शुद्धता, प्रकाश), रजस (क्रिया, उत्साह) और तमस (जड़ता, अज्ञान) — का उद्गम स्वयं को बताते हैं। सृष्टि में जो कुछ भी है, वह इन्हीं तीन गुणों के संयोग से बना है और ये गुण परमात्मा से ही प्रकट हुए हैं। किंतु परमात्मा इन गुणों से बंधे नहीं हैं — वे इनसे परे और अप्रभावित हैं। जैसे सूर्य से प्रकाश निकलता है, पर सूर्य स्वयं अंधकार से अछूता रहता है, वैसे ही परमात्मा गुणों के स्रोत होते हुए भी उनसे अलिप्त हैं।

आज के जीवन में: ईश्वर सब कुछ का आधार है, फिर भी वह किसी से बंधा नहीं — यह समझ हमें कर्म करते हुए आसक्ति से मुक्त रहना सिखाती है।


श्लोक 7.13

वक्ता: श्रीकृष्ण

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥7.13॥

tribhir guṇa-mayair bhāvair ebhiḥ sarvam idaṁ jagat / mohitaṁ nābhijānāti māmebhyaḥ param avyayam

हिंदी अनुवाद: इन तीनों गुणों से बने भावों के कारण मोहित हुआ यह सारा जगत इन गुणों से परे, अविनाशी मुझे नहीं जान पाता।

भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि तीनों गुण — सत्त्व, रजस और तमस — मिलकर एक ऐसा आवरण बना देते हैं जिससे मनुष्य की दृष्टि भटक जाती है। वह संसार की वस्तुओं, सुख-दुःख और परिस्थितियों में ही उलझा रहता है और उस परम सत्य को नहीं देख पाता जो इन सबसे ऊपर है। 'मोहितम्' का अर्थ है भ्रमित या मोह में पड़ा हुआ। 'अव्ययम्' का अर्थ है जो कभी नष्ट नहीं होता। गुणों का यह मोह ही अज्ञान का मूल कारण है।

आज के जीवन में: जब हम सुख-दुःख, लाभ-हानि में इतने खो जाते हैं कि भीतर की शांत सत्ता को भूल जाते हैं, तो यही गुणों का मोह है।


श्लोक 7.14

वक्ता: श्रीकृष्ण

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥7.14॥

daivī hyeṣhā guṇa-mayī mama māyā duratyayā / mām eva ye prapadyante māyām etāṁ taranti te

हिंदी अनुवाद: क्योंकि मेरी यह तीन गुणों से बनी दैवी माया बड़ी दुर्लंघ्य है। जो केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण माया को 'दैवी' कहते हैं — अर्थात् यह साधारण भ्रम नहीं, बल्कि परमात्मा की अद्भुत शक्ति है। 'दुरत्यया' का अर्थ है जिसे पार करना अत्यंत कठिन है। अपने बल, बुद्धि या साधनों से इसे पार करना संभव नहीं। एकमात्र उपाय है — परमात्मा की पूर्ण शरण। 'प्रपद्यन्ते' का अर्थ है शरण में आना, समर्पण करना। जो व्यक्ति अहंकार छोड़कर ईश्वर पर पूरा भरोसा रखता है, माया उसे बाँध नहीं पाती।

आज के जीवन में: जीवन की उलझनें जब अपने बल से न सुलझें, तब ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव ही सच्चा मार्ग है।


श्लोक 7.15

वक्ता: श्रीकृष्ण

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥7.15॥

na māṁ duṣhkṛitino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ / māyayāpahṛita-jñānā āsuraṁ bhāvam āśhritāḥ

हिंदी अनुवाद: जिनका ज्ञान माया ने हर लिया है, जो आसुरी स्वभाव के आश्रय में हैं और जो मनुष्यों में अत्यंत नीच तथा बुरे कर्म करने वाले मूढ़ हैं — ऐसे लोग मेरी शरण नहीं आते।

भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि माया से पार होने का मार्ग सबके लिए खुला है, किंतु कुछ लोग उस मार्ग पर चलते ही नहीं। 'दुष्कृतिनः' अर्थात् बुरे कर्म करने वाले, 'मूढाः' अर्थात् विवेकहीन, और 'नराधमाः' अर्थात् मनुष्यों में अधम — ये ईश्वर की ओर नहीं मुड़ते। 'आसुरं भावम्' अर्थात् आसुरी स्वभाव — जिसमें अहंकार, स्वार्थ और दूसरों की उपेक्षा होती है। जिनका ज्ञान माया ने ढक लिया है, वे ईश्वर को खोजने की आवश्यकता ही नहीं समझते।

आज के जीवन में: अहंकार और स्वार्थ में डूबा मन ईश्वर की ओर नहीं मुड़ता — इसलिए विनम्रता और सत्कर्म साधना के पहले सोपान हैं।


श्लोक 7.16

वक्ता: श्रीकृष्ण

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥7.16॥

chatur-vidhā bhajante māṁ janāḥ sukṛitino ’rjuna / ārto jijñāsur arthārthī jñānī cha bharatarṣhabha

हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! पवित्र कर्म करने वाले चार प्रकार के मनुष्य मेरा भजन करते हैं — आर्त (दुःखी), जिज्ञासु (जानने का इच्छुक), अर्थार्थी (सांसारिक कामना रखने वाला) और ज्ञानी।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ उन लोगों का वर्णन करते हैं जो ईश्वर की ओर मुड़ते हैं। 'आर्त' वह है जो किसी कष्ट या संकट में पड़कर ईश्वर को पुकारता है। 'जिज्ञासु' वह है जो सत्य को जानने की जिज्ञासा से भजन करता है। 'अर्थार्थी' वह है जो किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ईश्वर की शरण लेता है। 'ज्ञानी' वह है जो केवल प्रेम और ज्ञान से भजन करता है। ये चारों 'सुकृतिनः' अर्थात् पुण्यात्मा हैं — इनके मन में ईश्वर की ओर मुड़ने की पात्रता है।

आज के जीवन में: चाहे दुःख में हो, जिज्ञासा में हो, किसी कामना में हो या शुद्ध प्रेम में — ईश्वर की ओर मुड़ना सदा कल्याणकारी है।


श्लोक 7.17

वक्ता: श्रीकृष्ण

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्ितर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥7.17॥

teṣhāṁ jñānī nitya-yukta eka-bhaktir viśhiṣhyate / priyo hi jñānino ’tyartham ahaṁ sa cha mama priyaḥ

हिंदी अनुवाद: उन चारों में जो ज्ञानी है, जो निरंतर मुझमें लगा रहता है और अनन्य भक्ति रखता है, वह सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि मैं उस ज्ञानी को अत्यंत प्रिय हूँ और वह भी मुझे अत्यंत प्रिय है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण चारों प्रकार के भक्तों में ज्ञानी की विशेष महिमा बताते हैं। 'नित्ययुक्त' अर्थात् जो सदा परमात्मा में स्थित रहता है, और 'एकभक्ति' अर्थात् जिसकी भक्ति अनन्य है — वह किसी कामना या भय से नहीं, बल्कि शुद्ध प्रेम से भजन करता है। ऐसे भक्त और परमात्मा के बीच एक विशेष प्रेम का संबंध होता है — दोनों एक-दूसरे के प्रिय हैं। यह पारस्परिक प्रेम ही ज्ञानी की भक्ति को सर्वोच्च बनाता है।

आज के जीवन में: जब भक्ति किसी माँग से नहीं, बल्कि शुद्ध प्रेम से होती है, तब वह सबसे गहरी और सबसे फलदायी होती है।


श्लोक 7.18

वक्ता: श्रीकृष्ण

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥7.18॥

udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam / āsthitaḥ sa hi yuktātmā mām evānuttamāṁ gatim

हिंदी अनुवाद: ये सभी भक्त उदार और श्रेष्ठ हैं। किंतु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है — ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह स्थिर चित्त से मुझमें ही, जो सर्वोत्तम गति है, दृढ़ता से स्थित है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण पहले यह स्पष्ट करते हैं कि सभी चारों प्रकार के भक्त 'उदाराः' अर्थात् महान हृदय वाले हैं — किसी को कम नहीं आँका जाना चाहिए। परंतु ज्ञानी की स्थिति अद्वितीय है — वह परमात्मा से इतना एकरूप हो जाता है कि श्रीकृष्ण उसे अपना स्वरूप ही मानते हैं। 'युक्तात्मा' अर्थात् जिसका मन परमात्मा में पूरी तरह समाया हुआ है। ऐसे भक्त के लिए परमात्मा ही एकमात्र और सर्वोत्तम लक्ष्य है।

आज के जीवन में: जब साधक इतना एकाग्र हो जाए कि उसके और ईश्वर के बीच का भेद मिट जाए, तो यही भक्ति की पराकाष्ठा है।


श्लोक 7.19

वक्ता: श्रीकृष्ण

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥7.19॥

bahūnāṁ janmanām ante jñānavān māṁ prapadyate / vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā su-durlabhaḥ

हिंदी अनुवाद: अनेक जन्मों के अंत में ज्ञानवान पुरुष मेरी शरण आता है — यह जानकर कि 'वासुदेव ही सब कुछ है'। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह ज्ञान — कि परमात्मा ही सर्वत्र है, सब कुछ में वही है — एक ही जन्म में नहीं मिलता। अनेक जन्मों की साधना, अनुभव और विवेक के बाद यह बोध होता है। 'वासुदेवः सर्वम्' — अर्थात् सब कुछ वासुदेव (परमात्मा) ही है — यह केवल बौद्धिक समझ नहीं, बल्कि गहरी अनुभूति है। ऐसे 'महात्मा' अर्थात् विशाल हृदय वाले ज्ञानी संसार में बहुत कम होते हैं, इसीलिए वे 'सुदुर्लभ' कहे गए हैं।

आज के जीवन में: जब हर वस्तु, हर प्राणी और हर परिस्थिति में परमात्मा की उपस्थिति दिखने लगे, तो समझो कि ज्ञान परिपक्व हो रहा है।


श्लोक 7.20

वक्ता: श्रीकृष्ण

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥7.20॥

kāmais tais tair hṛita-jñānāḥ prapadyante ’nya-devatāḥ / taṁ taṁ niyamam āsthāya prakṛityā niyatāḥ svayā

हिंदी अनुवाद: जिन लोगों का ज्ञान अनेक कामनाओं ने हर लिया है, वे अपनी-अपनी प्रकृति से प्रेरित होकर उन-उन नियमों को धारण करते हुए अन्य देवताओं की शरण लेते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ उन लोगों का वर्णन करते हैं जो विभिन्न कामनाओं — धन, स्वास्थ्य, संतान, यश आदि — के वशीभूत होकर अलग-अलग देवताओं की उपासना करते हैं। 'हृतज्ञानाः' अर्थात् जिनका विवेक कामनाओं ने ढक लिया है। 'प्रकृत्या नियताः' अर्थात् अपने स्वभाव और संस्कारों से बंधे हुए। वे जो उपासना करते हैं वह गलत नहीं है, किंतु वह अधूरी है — क्योंकि उसके पीछे कामना है, न कि शुद्ध प्रेम या ज्ञान।

आज के जीवन में: कामनाओं से प्रेरित उपासना सीमित फल देती है; जब इच्छाएँ शांत होती हैं, तभी परमात्मा की ओर सच्चा मुड़ाव होता है।


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