भगवद्गीता अध्याय 7, श्लोक 21–30 | ज्ञानविज्ञानयोग | अर्थ सहित
अध्याय सात के पूर्वार्ध में श्रीकृष्ण ने अपनी अपरा और परा प्रकृति, माया और भक्तों के चार प्रकार समझाए। अब इस अंतिम खंड में वे बताते हैं कि देवताओं की उपासना में उनकी ही शक्ति काम करती है, फिर भी उसका फल सीमित है; जबकि जो उन्हें ही जानते और भजते हैं, वे जन्म-मरण से मुक्त होकर उन्हें ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक 7.21
वक्ता: श्रीकृष्ण
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥7.21॥
yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhati / tasya tasyāchalāṁ śhraddhāṁ tām eva vidadhāmyaham
हिंदी अनुवाद: जो भक्त जिस देवता की श्रद्धापूर्वक पूजा करना चाहता है, उस देवता के प्रति मैं ही उसकी श्रद्धा को दृढ़ और स्थिर कर देता हूँ।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि संसार में जितनी भी उपासनाएँ होती हैं, उन सबके मूल में उनकी ही शक्ति है। 'तनुं' अर्थात् देवता का स्वरूप — चाहे भक्त किसी भी रूप की पूजा करे, उस पूजा में जो श्रद्धा जागती है, वह श्रीकृष्ण ही प्रदान करते हैं। इस प्रकार वे यह स्पष्ट करते हैं कि समस्त भक्ति की शक्ति का स्रोत एक ही परमसत्ता है।
आज के जीवन में: जो श्रद्धा हमें किसी भी शुभ कार्य में लगाती है, वह भीतर से मिली हुई दैवी शक्ति है — इसे पहचानकर श्रद्धा को और गहरा करें।
श्लोक 7.22
वक्ता: श्रीकृष्ण
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान् ॥7.22॥
sa tayā śhraddhayā yuktas tasyārādhanam īhate / labhate cha tataḥ kāmān mayaiva vihitān hi tān
हिंदी अनुवाद: उस दृढ़ श्रद्धा से युक्त होकर वह मनुष्य उस देवता की उपासना करता है और उसकी मनोकामना पूरी भी होती है — किंतु वह फल मेरे ही विधान से मिलता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि देवताओं की उपासना से जो फल मिलता है, वह भी वास्तव में उन्हीं के विधान से प्राप्त होता है। 'विहितान्' अर्थात् विधि से नियत किया हुआ — अर्थात् फल देने की शक्ति देवताओं में नहीं, परमात्मा में है। भक्त को फल मिलता है, किंतु वह फल उसी सर्वोच्च सत्ता की व्यवस्था का अंग है।
आज के जीवन में: हमें जो भी मिलता है, वह किसी न किसी उच्चतर व्यवस्था का अंग है — इस भाव से कृतज्ञता और विनम्रता बनी रहती है।
श्लोक 7.23
वक्ता: श्रीकृष्ण
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥7.23॥
antavat tu phalaṁ teṣhāṁ tad bhavatyalpa-medhasām / devān deva-yajo yānti mad-bhaktā yānti mām api
हिंदी अनुवाद: परंतु उन अल्पबुद्धि मनुष्यों को देवताओं की आराधना से मिलने वाला फल नाशवान होता है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ फल की सीमा बताते हैं। 'अल्पमेधसाम्' अर्थात् जिनकी बुद्धि सीमित है — वे क्षणिक सुख के लिए देवताओं की पूजा करते हैं और उन्हें वैसा ही सीमित फल मिलता है। जो परमात्मा को भजते हैं, वे परमात्मा को ही प्राप्त होते हैं। यह श्लोक उपासना के लक्ष्य और उसके परिणाम का तुलनात्मक विवेचन करता है।
आज के जीवन में: जिस लक्ष्य की ओर हम चलते हैं, वहीं पहुँचते हैं — इसलिए जीवन का लक्ष्य ऊँचा और स्थायी रखें।
श्लोक 7.24
वक्ता: श्रीकृष्ण
अव्यक्तं व्यक्ितमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥7.24॥
avyaktaṁ vyaktim āpannaṁ manyante mām abuddhayaḥ / paraṁ bhāvam ajānanto mamāvyayam anuttamam
हिंदी अनुवाद: बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ और अविनाशी परमभाव को न जानते हुए, मुझ अव्यक्त परमात्मा को साधारण मनुष्य की भाँति शरीरधारी मान लेते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो लोग उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते, वे उन्हें केवल एक मनुष्य समझते हैं। 'अव्यक्तं' अर्थात् जो इंद्रियों और मन से परे है; 'अनुत्तमम्' अर्थात् सर्वोत्तम। परमात्मा का यह परमभाव अज्ञानी की दृष्टि से छिपा रहता है। यह श्लोक परमात्मा की अनंत और अविनाशी प्रकृति को समझने का आग्रह करता है।
आज के जीवन में: जो दिखता है, वही सब कुछ नहीं होता — किसी भी महान सत्य की गहराई को समझने के लिए विवेकपूर्ण दृष्टि चाहिए।
श्लोक 7.25
वक्ता: श्रीकृष्ण
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥7.25॥
nāhaṁ prakāśhaḥ sarvasya yoga-māyā-samāvṛitaḥ / mūḍho ’yaṁ nābhijānāti loko mām ajam avyayam
हिंदी अनुवाद: मैं अपनी योगमाया से आवृत रहता हूँ, इसलिए सबके सामने प्रकट नहीं होता। यह मोहग्रस्त संसार मुझे — जो अजन्मा और अविनाशी हूँ — ठीक से नहीं जान पाता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि उनकी 'योगमाया' — अर्थात् उनकी दिव्य शक्ति का आवरण — उन्हें सामान्य दृष्टि से छिपाए रखता है। 'मूढ़' अर्थात् जो अज्ञान में हैं, वे उनके अजन्मे और अविनाशी स्वरूप को नहीं पहचान पाते। यह योगमाया दंड नहीं, बल्कि प्रकृति की वह व्यवस्था है जो ज्ञान के बिना परमसत्य को अदृश्य रखती है।
आज के जीवन में: परमसत्य को जानने के लिए केवल बाहरी आँखें नहीं, भीतरी विवेक और श्रद्धा चाहिए।
श्लोक 7.26
वक्ता: श्रीकृष्ण
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥7.26॥
vedāhaṁ samatītāni vartamānāni chārjuna / bhaviṣhyāṇi cha bhūtāni māṁ tu veda na kaśhchana
हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! जो प्राणी भूतकाल में हो चुके हैं, जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे — उन सबको मैं जानता हूँ; परंतु मुझे कोई नहीं जानता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अपनी सर्वज्ञता का वर्णन करते हैं। वे तीनों कालों — भूत, वर्तमान और भविष्य — के समस्त प्राणियों को जानते हैं, किंतु उन्हें कोई साधारण मनुष्य नहीं जान पाता। यह असमानता इसलिए है क्योंकि जीव माया और द्वन्द्व में बँधा है, जबकि परमात्मा उससे सर्वथा परे हैं। यह श्लोक परमात्मा की अनंत चेतना और जीव की सीमित दृष्टि का अंतर दर्शाता है।
आज के जीवन में: हमारी जानकारी सीमित और परिस्थितिजन्य है — इस विनम्रता के साथ जीना ही सच्चे ज्ञान की शुरुआत है।
श्लोक 7.27
वक्ता: श्रीकृष्ण
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥7.27॥
ichchhā-dveṣha-samutthena dvandva-mohena bhārata / sarva-bhūtāni sammohaṁ sarge yānti parantapa
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी परंतप! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न होने वाले द्वन्द्व-मोह से मोहित होकर सभी प्राणी जन्म लेते ही भ्रम में पड़ जाते हैं और जन्म-मरण के चक्र में बँधे रहते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि जीव के अज्ञान का मूल कारण 'इच्छा' और 'द्वेष' से उत्पन्न 'द्वन्द्व-मोह' है — अर्थात् सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय जैसे विरोधी भावों में उलझना। 'सर्गे' अर्थात् जन्म के समय से ही यह मोह प्राणी को घेर लेता है। इसी कारण वे परमात्मा को नहीं जान पाते और संसार-चक्र में बने रहते हैं।
आज के जीवन में: राग और द्वेष ही हमारी दृष्टि को धुँधला करते हैं — इन्हें पहचानना ही मुक्ति की पहली सीढ़ी है।
श्लोक 7.28
वक्ता: श्रीकृष्ण
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥7.28॥
yeṣhāṁ tvanta-gataṁ pāpaṁ janānāṁ puṇya-karmaṇām / te dvandva-moha-nirmuktā bhajante māṁ dṛiḍha-vratāḥ
हिंदी अनुवाद: परंतु जिन पुण्यकर्मी मनुष्यों के पाप नष्ट हो गए हैं, वे द्वन्द्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़ संकल्प के साथ मेरा भजन करते हैं।
भावार्थ: पिछले श्लोक में द्वन्द्व-मोह की बात कही गई थी। अब श्रीकृष्ण उसका अपवाद बताते हैं। जिन्होंने पुण्यकर्म किए हैं और जिनके भीतर के विकार क्षीण हो गए हैं, वे 'दृढव्रताः' — अर्थात् दृढ़ निश्चय वाले — होकर परमात्मा की भक्ति में लग जाते हैं। पाप का नाश और द्वन्द्व से मुक्ति — ये दोनों भक्ति के मार्ग को खोलते हैं।
आज के जीवन में: जब मन के भीतर की उलझनें कम होती हैं, तब ही किसी उच्च लक्ष्य के प्रति सच्ची निष्ठा जागती है।
श्लोक 7.29
वक्ता: श्रीकृष्ण
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥7.29॥
jarā-maraṇa-mokṣhāya mām āśhritya yatanti ye / te brahma tadviduḥ kṛitsnam adhyātmaṁ karma chākhilam
हिंदी अनुवाद: जो वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, संपूर्ण अध्यात्म को और समस्त कर्म को भी जान लेते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ मोक्ष के साधक का वर्णन करते हैं। 'जरामरणमोक्षाय' — अर्थात् जन्म-मरण के बंधन से छूटने की इच्छा से जो परमात्मा की शरण लेते हैं, वे केवल मुक्ति ही नहीं पाते, बल्कि ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म का संपूर्ण ज्ञान भी उन्हें स्वतः प्राप्त हो जाता है। परमात्मा की शरण ज्ञान का द्वार खोलती है।
आज के जीवन में: जब हम किसी उच्च उद्देश्य के लिए सच्चे मन से प्रयत्न करते हैं, तो उससे जुड़ा गहरा ज्ञान भी अपने आप मिलता जाता है।
श्लोक 7.30
वक्ता: श्रीकृष्ण
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥7.30॥
sādhibhūtādhidaivaṁ māṁ sādhiyajñaṁ cha ye viduḥ / prayāṇa-kāle ’pi cha māṁ te vidur yukta-chetasaḥ
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित मुझे जानते हैं, वे स्थिरचित्त होकर अंतकाल में भी मुझे ही जानते और प्राप्त होते हैं।
भावार्थ: अध्याय के अंतिम श्लोक में श्रीकृष्ण तीन विशेष शब्द देते हैं — 'अधिभूत' अर्थात् समस्त भौतिक तत्त्वों में व्याप्त, 'अधिदैव' अर्थात् दैवी शक्तियों के अधिष्ठाता, और 'अधियज्ञ' अर्थात् यज्ञ के अंतर्यामी। जो इन सभी रूपों में परमात्मा को पहचानते हैं और 'युक्तचेतस्' — अर्थात् एकाग्र चित्त — रहते हैं, वे अंतिम क्षण में भी उन्हें ही प्राप्त होते हैं। यह अगले अध्याय की भूमिका भी बनाता है।
आज के जीवन में: जो ज्ञान और भाव जीवनभर हमारे साथ रहता है, वही अंत में भी हमारा साथी बनता है — इसलिए अभी से सही दिशा में चित्त लगाएँ।
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