भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 8, श्लोक 1–10 | अक्षरब्रह्मयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 8, श्लोक 1–10 | अक्षरब्रह्मयोग | अर्थ सहित

सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने ज्ञान, विज्ञान, माया और भक्ति का विस्तार से वर्णन किया। अब आठवें अध्याय 'अक्षरब्रह्मयोग' में अर्जुन उन शब्दों का अर्थ जानना चाहते हैं जो पिछले उपदेश में आए थे — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ। श्रीकृष्ण इन प्रश्नों के उत्तर देते हुए यह भी बताते हैं कि अंतकाल में किस प्रकार का स्मरण मनुष्य को किस गति तक पहुँचाता है।

श्लोक 8.1

वक्ता: अर्जुन

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥8.1॥

arjuna uvācha / kiṁ tad brahma kim adhyātmaṁ kiṁ karma puruṣhottama / adhibhūtaṁ cha kiṁ proktam adhidaivaṁ kim uchyate

हिंदी अनुवाद: अर्जुन ने पूछा — हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहते हैं और अधिदैव किसे कहा जाता है?

भावार्थ: सातवें अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण ने कई पारिभाषिक शब्दों का उल्लेख किया था। अर्जुन उन शब्दों का स्पष्ट अर्थ जानना चाहते हैं। वे श्रीकृष्ण को 'पुरुषोत्तम' — अर्थात् पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ — कहकर संबोधित करते हैं। यह प्रश्न केवल जिज्ञासा से नहीं, बल्कि गहरी साधना की इच्छा से उठाया गया है। अर्जुन चाहते हैं कि जो शब्द सुने हैं, उनका भीतरी अर्थ भी समझ में आए।

आज के जीवन में: जो शब्द सुनें, उनका अर्थ भी जानने की जिज्ञासा रखना — यही सच्ची सीखने की वृत्ति है।


श्लोक 8.2

वक्ता: अर्जुन

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥8.2॥

adhiyajñaḥ kathaṁ ko ’tra dehe ’smin madhusūdana / prayāṇa-kāle cha kathaṁ jñeyo ’si niyatātmabhiḥ

हिंदी अनुवाद: हे मधुसूदन! इस देह में अधियज्ञ कौन है और वह कैसे है? और अंतकाल में वशीभूत अंतःकरण वाले मनुष्यों द्वारा आप कैसे जाने जाते हैं?

भावार्थ: अर्जुन अपने प्रश्नों को आगे बढ़ाते हैं। वे 'मधुसूदन' — मधु नामक असुर का नाश करने वाले — कहकर श्रीकृष्ण को संबोधित करते हैं। 'नियतात्मा' का अर्थ है जिसका अंतःकरण वश में है। अर्जुन का यह प्रश्न अत्यंत व्यावहारिक है — अंतकाल में, जब मन डगमगाता है, तब भी परमात्मा को कैसे जाना जाए? यह प्रश्न साधक के जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण चिंता को सामने रखता है।

आज के जीवन में: जीवन के कठिन क्षणों में भी परमात्मा को कैसे स्मरण रखा जाए — यह प्रश्न हर साधक के मन में उठना चाहिए।


श्लोक 8.3

वक्ता: श्रीकृष्ण

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥8.3॥

śhrī bhagavān uvācha / akṣharaṁ brahma paramaṁ svabhāvo ’dhyātmam uchyate / bhūta-bhāvodbhava-karo visargaḥ karma-sanjñitaḥ

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — परम अक्षर ब्रह्म है; जीव का अपना स्वभाव अध्यात्म कहलाता है; और प्राणियों की सत्ता को प्रकट करने वाला जो विसर्ग (त्याग या अर्पण) है, उसे कर्म कहते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर क्रम से देते हैं। 'अक्षर' का अर्थ है जो कभी नष्ट न हो — वही परम ब्रह्म है। 'अध्यात्म' अर्थात् जीव का अपना होनापन, उसकी स्वयं की चेतना। 'कर्म' केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि वह अर्पण या विसर्ग है जिससे प्राणियों का उद्भव और पोषण होता है। ये तीनों परिभाषाएँ गहरी हैं और साधक को भीतर से समझनी होती हैं।

आज के जीवन में: ब्रह्म, आत्मा और कर्म — इन तीनों को समझना ही आध्यात्मिक जीवन की नींव है।


श्लोक 8.4

वक्ता: श्रीकृष्ण

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥8.4॥

adhibhūtaṁ kṣharo bhāvaḥ puruṣhaśh chādhidaivatam / adhiyajño ’ham evātra dehe deha-bhṛitāṁ vara

हिंदी अनुवाद: हे देहधारियों में श्रेष्ठ! नाशवान् पदार्थ को अधिभूत कहते हैं, हिरण्यगर्भ पुरुष अधिदैव है, और इस देह में अंतर्यामी रूप से मैं ही अधियज्ञ हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण शेष तीन प्रश्नों के उत्तर देते हैं। 'क्षरभाव' अर्थात् जो बदलता और नष्ट होता है — वही अधिभूत है। 'पुरुष' अर्थात् हिरण्यगर्भ — सृष्टि का मूल कारण — अधिदैव है। और सबसे महत्त्वपूर्ण — इस देह में जो यज्ञ का अधिष्ठाता है, वह स्वयं श्रीकृष्ण हैं। वे 'देहभृतां वर' — देहधारियों में श्रेष्ठ — कहकर अर्जुन को संबोधित करते हैं।

आज के जीवन में: जो नाशवान् है उसे पहचानना और जो अविनाशी है उसे जानना — यही विवेक है।


श्लोक 8.5

वक्ता: श्रीकृष्ण

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥8.5॥

anta-kāle cha mām eva smaran muktvā kalevaram / yaḥ prayāti sa mad-bhāvaṁ yāti nāstyatra sanśhayaḥ

हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अंतकाल में मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मेरे स्वरूप को ही प्राप्त होता है — इसमें कोई संदेह नहीं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अंतकाल के स्मरण का फल बताते हैं। 'कलेवरम्' अर्थात् शरीर और 'मद्भावम्' अर्थात् मेरा स्वरूप। जो व्यक्ति जीवन भर परमात्मा में मन लगाता है, उसके लिए अंतकाल में भी वही स्मरण स्वाभाविक रूप से आता है। यह श्लोक भय से नहीं, बल्कि आश्वासन से कहा गया है — जो सच्चे मन से स्मरण करे, उसकी गति निश्चित है।

आज के जीवन में: जीवन भर जिसका स्मरण करें, अंतकाल में भी वही स्वाभाविक रूप से मन में आता है — इसलिए अभी से परमात्मा का स्मरण अभ्यास में लाएँ।


श्लोक 8.6

वक्ता: श्रीकृष्ण

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥8.6॥

yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ tyajatyante kalevaram / taṁ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ

हिंदी अनुवाद: हे कुंतीपुत्र! मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, उस भाव से सदा भावित होने के कारण वह उसी को प्राप्त होता है।

भावार्थ: यह श्लोक एक सार्वभौमिक नियम बताता है। 'तद्भावभावितः' — जो जिस भाव में सदा रमा रहता है, अंतकाल में वही भाव उभरता है और वही गति मिलती है। यह केवल अंतकाल की बात नहीं, बल्कि जीवन भर के संस्कारों का परिणाम है। श्रीकृष्ण यहाँ 'कौन्तेय' — कुंती के पुत्र — कहकर अर्जुन को संबोधित करते हैं।

आज के जीवन में: मन जिस विचार में बार-बार रमता है, वही हमारा स्वभाव बन जाता है — इसलिए विचारों की दिशा पर ध्यान देना आवश्यक है।


श्लोक 8.7

वक्ता: श्रीकृष्ण

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥8.7॥

tasmāt sarveṣhu kāleṣhu mām anusmara yudhya cha / mayyarpita-mano-buddhir mām evaiṣhyasyasanśhayam

हिंदी अनुवाद: इसलिए सब समय मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मन और बुद्धि मुझमें अर्पित करने वाला तू निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा।

भावार्थ: पिछले दो श्लोकों के सिद्धांत से व्यावहारिक निर्देश निकलता है। श्रीकृष्ण कहते हैं — अपना कर्तव्य छोड़ने की आवश्यकता नहीं, युद्ध करो, पर मन और बुद्धि मुझमें लगाए रखो। 'मय्यर्पितमनोबुद्धिः' — मन और बुद्धि दोनों का अर्पण। यह योग का व्यावहारिक रूप है — बाहर से कर्म, भीतर से स्मरण। यही कर्मयोग और भक्ति का समन्वय है।

आज के जीवन में: अपना काम करते हुए भी मन को परमात्मा में लगाए रखना — यही सच्चा योग है।


श्लोक 8.8

वक्ता: श्रीकृष्ण

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥8.8॥

abhyāsa-yoga-yuktena chetasā nānya-gāminā / paramaṁ puruṣhaṁ divyaṁ yāti pārthānuchintayan

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! अभ्यासयोग से युक्त और अन्य विषयों में न भटकने वाले चित्त से परम दिव्य पुरुष का चिंतन करता हुआ मनुष्य उसी को प्राप्त होता है।

भावार्थ: 'अभ्यासयोग' अर्थात् बार-बार के अभ्यास से मन को एकाग्र करने की साधना। 'नान्यगामिना' — जो अन्य विषयों की ओर न जाए। यह एकाग्रता रातोरात नहीं आती, इसके लिए निरंतर अभ्यास चाहिए। श्रीकृष्ण 'पार्थ' कहकर अर्जुन को संबोधित करते हैं। परम दिव्य पुरुष का चिंतन — अर्थात् उसके गुणों और स्वरूप का मन में बार-बार स्मरण — ही उस तक पहुँचने का मार्ग है।

आज के जीवन में: मन की एकाग्रता अभ्यास से आती है — प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा अभ्यास ही बड़ी साधना बनता है।


श्लोक 8.9

वक्ता: श्रीकृष्ण

कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥8.9॥

kaviṁ purāṇam anuśhāsitāram / aṇor aṇīyānsam anusmared yaḥ / sarvasya dhātāram achintya-rūpam / āditya-varṇaṁ tamasaḥ parastāt

हिंदी अनुवाद: जो सर्वज्ञ, अनादि, सबके शासक, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले, अचिन्त्य स्वरूप, सूर्य के समान प्रकाशमान और अज्ञान के सर्वथा परे हैं — ऐसे परमात्मा का जो चिंतन करता है।

भावार्थ: यह श्लोक उस परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करता है जिसका ध्यान करना है। 'कविम्' — सर्वज्ञ, 'पुराणम्' — अनादि, 'अणोरणीयांसम्' — परमाणु से भी सूक्ष्म, 'अचिन्त्यरूपम्' — जिसका स्वरूप मन और बुद्धि से परे है, 'आदित्यवर्णम्' — सूर्य के समान स्वयंप्रकाश। यह श्लोक अगले श्लोक के साथ मिलकर पूर्ण होता है — ध्यान का विषय और ध्यान की विधि दोनों साथ आते हैं।


श्लोक 8.10

वक्ता: श्रीकृष्ण

प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥8.10॥

prayāṇa-kāle manasāchalena / bhaktyā yukto yoga-balena chaiva / bhruvor madhye prāṇam āveśhya samyak / sa taṁ paraṁ puruṣham upaiti divyam

हिंदी अनुवाद: वह भक्तियुक्त मनुष्य अंतसमय में अचल मन से और योगबल के द्वारा भृकुटी के मध्य में प्राणों को भली-भाँति स्थित करके उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

भावार्थ: पिछले श्लोक में वर्णित परमात्मा का ध्यान करने वाला साधक, जब अंतकाल आता है, तो अचल मन, भक्ति और योगबल के सहारे प्राणों को भृकुटी के मध्य में स्थिर करता है। 'भ्रुवोर्मध्ये' — दोनों भौंहों के बीच का स्थान। यह योग की एक विशेष साधना है। 'योगबल' अर्थात् जीवन भर के अभ्यास से अर्जित शक्ति। ऐसा साधक उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

आज के जीवन में: जीवन भर की भक्ति और अभ्यास ही अंतकाल में मन को स्थिर रखने की शक्ति देते हैं।


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