भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 8, श्लोक 11–20 | अक्षरब्रह्मयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 8, श्लोक 11–20 | अक्षरब्रह्मयोग | अर्थ सहित

अध्याय ८ में अर्जुन ने श्रीकृष्ण से ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के विषय में प्रश्न किए थे। श्रीकृष्ण ने उन प्रश्नों के उत्तर देते हुए अंतकाल की भावना का महत्त्व समझाया। अब इस खंड में वे उस अविनाशी परम पद का वर्णन करते हैं जिसे वेदवेत्ता 'अक्षर' कहते हैं, उसे पाने की साधना बताते हैं, और सृष्टि के उत्पत्ति-प्रलय के महाचक्र का तथा उससे परे के शाश्वत तत्त्व का परिचय देते हैं।

श्लोक 8.11

वक्ता: श्रीकृष्ण

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥8.11॥

yad akṣharaṁ veda-vido vadanti / viśhanti yad yatayo vīta-rāgāḥ / yad ichchhanto brahmacharyaṁ charanti / tat te padaṁ saṅgraheṇa pravakṣhye

हिंदी अनुवाद: वेद जानने वाले जिसे 'अक्षर' कहते हैं, वीतराग यति जिसे प्राप्त करते हैं, और जिसकी चाह में साधक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं — वह परम पद मैं तुम्हें संक्षेप में बताऊँगा।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जिस लक्ष्य की ओर वेदशास्त्र संकेत करते हैं, जिसे पाने के लिए संन्यासी अपनी समस्त कामनाएँ त्यागते हैं और जिज्ञासु साधक ब्रह्मचर्य जैसे कठोर अनुशासन का पालन करते हैं — वह 'अक्षर' अर्थात् अविनाशी परम पद है। 'वीतराग' का अर्थ है जिनके भीतर राग-आसक्ति नहीं रही। श्रीकृष्ण उस पद को संक्षेप में समझाने का वचन देते हैं।

आज के जीवन में: जो लक्ष्य सच्चा और शाश्वत हो, उसके लिए अनुशासन और एकाग्रता से जीना ही सच्ची साधना है।


श्लोक 8.12

वक्ता: श्रीकृष्ण

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥8.12॥

sarva-dvārāṇi sanyamya mano hṛidi nirudhya cha / mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇam āsthito yoga-dhāraṇām

हिंदी अनुवाद: इंद्रियों के सभी द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके और प्राणों को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में भली-भाँति स्थित हो जाओ।

भावार्थ: यह श्लोक उस ध्यान-साधना की विधि बताता है जिससे साधक परम पद की ओर बढ़ता है। 'सर्वद्वाराणि संयम्य' का अर्थ है — आँख, कान, नाक आदि इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाना। मन को हृदय में केंद्रित करना और प्राण-शक्ति को ऊर्ध्वमुखी करना — यह योगधारणा की आंतरिक प्रक्रिया है। श्रीकृष्ण यहाँ अंतर्मुखी साधना का क्रम समझा रहे हैं।

आज के जीवन में: जब मन बाहर भटकता हो, तब इंद्रियों को भीतर की ओर मोड़कर एकाग्र होने का अभ्यास जीवन में शांति लाता है।


श्लोक 8.13

वक्ता: श्रीकृष्ण

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥8.13॥

oṁ ityekākṣharaṁ brahma vyāharan mām anusmaran / yaḥ prayāti tyajan dehaṁ sa yāti paramāṁ gatim

हिंदी अनुवाद: जो साधक 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए और मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

भावार्थ: पिछले श्लोक में बताई गई योगधारणा में स्थित होकर जो साधक अंत समय में 'ॐ' का उच्चारण और श्रीकृष्ण का स्मरण करता हुआ देह त्यागता है, वह परम गति — अर्थात् मोक्ष — को पाता है। 'एकाक्षर ब्रह्म' का अर्थ है एक अक्षर वाला ब्रह्म-स्वरूप ओंकार। यहाँ ओंकार और ईश्वर-स्मरण दोनों को एक साथ जोड़ा गया है।

आज के जीवन में: जीवन भर जो भाव मन में बसाया जाए, वही अंत समय में स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है — इसलिए निरंतर श्रेष्ठ स्मरण का अभ्यास करना चाहिए।


श्लोक 8.14

वक्ता: श्रीकृष्ण

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥8.14॥

ananya-chetāḥ satataṁ yo māṁ smarati nityaśhaḥ / tasyāhaṁ sulabhaḥ pārtha nitya-yuktasya yoginaḥ

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जो मनुष्य अनन्य चित्त से मेरा नित्य-निरंतर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सहज सुलभ हो जाता हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जो साधक किसी अन्य विषय में मन न लगाकर केवल उन्हीं का स्मरण करता रहता है, उसके लिए वे सहज प्राप्य हैं। 'अनन्यचेताः' का अर्थ है — जिसका चित्त किसी अन्य में नहीं जाता। 'नित्ययुक्त' का अर्थ है — जो सदा परमात्मा से जुड़ा रहता है। यह श्लोक भक्ति और ध्यान की सरलता को रेखांकित करता है — जटिल साधना नहीं, केवल एकनिष्ठ स्मरण पर्याप्त है।

आज के जीवन में: जो काम पूरे मन से और निरंतर किया जाए, उसमें सफलता अवश्य मिलती है — यही सिद्धांत परमात्मा की प्राप्ति पर भी लागू होता है।


श्लोक 8.15

वक्ता: श्रीकृष्ण

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥8.15॥

mām upetya punar janma duḥkhālayam aśhāśhvatam / nāpnuvanti mahātmānaḥ sansiddhiṁ paramāṁ gatāḥ

हिंदी अनुवाद: मुझे प्राप्त करके महात्मा लोग इस दुःखों के घर और अनित्य पुनर्जन्म को फिर नहीं पाते, क्योंकि वे परम सिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ उस फल का वर्णन करते हैं जो उन्हें प्राप्त करने पर मिलता है। 'दुःखालयम्' अर्थात् दुःखों का घर — यह संसार सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु के चक्र से भरा है। 'अशाश्वतम्' अर्थात् जो टिकने वाला नहीं। जो महात्मा परम सिद्धि — परम प्रेम या मोक्ष — को पा लेते हैं, वे इस चक्र में नहीं लौटते। यह श्लोक मोक्ष की महिमा को सरल शब्दों में प्रकट करता है।

आज के जीवन में: जब भीतर से परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है, तब बाहर के सुख-दुःख का बंधन शिथिल पड़ जाता है।


श्लोक 8.16

वक्ता: श्रीकृष्ण

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥8.16॥

ā-brahma-bhuvanāl lokāḥ punar āvartino ’rjuna / mām upetya tu kaunteya punar janma na vidyate

हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावर्ती हैं अर्थात् वहाँ से भी लौटना पड़ता है; परंतु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।

भावार्थ: श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्मलोक जैसे उच्च लोक भी अंततः नाशवान हैं — वहाँ पहुँचने वाले जीव भी पुण्य क्षीण होने पर वापस लौटते हैं। केवल परमात्मा की प्राप्ति ही ऐसी है जिसके बाद पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है। 'पुनरावर्तिनः' का अर्थ है — जो फिर-फिर लौटते हैं। यह श्लोक सभी सांसारिक उपलब्धियों की सीमा और मोक्ष की श्रेष्ठता बताता है।

आज के जीवन में: संसार की कोई भी उपलब्धि स्थायी नहीं; जो भीतर से परमात्मा से जुड़ जाता है, उसे ही सच्ची और अंतिम शांति मिलती है।


श्लोक 8.17

वक्ता: श्रीकृष्ण

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥8.17॥

sahasra-yuga-paryantam ahar yad brahmaṇo viduḥ / rātriṁ yuga-sahasrāntāṁ te ’ho-rātra-vido janāḥ

हिंदी अनुवाद: जो लोग ब्रह्मा के एक दिन को एक हज़ार चतुर्युगी के बराबर और एक रात को भी एक हज़ार चतुर्युगी के बराबर जानते हैं, वे ही दिन और रात के वास्तविक ज्ञाता हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ सृष्टि के महाकाल का परिचय देते हैं। 'युग' का अर्थ है चतुर्युग — सत, त्रेता, द्वापर और कलि का एक पूरा चक्र। ब्रह्मा का एक दिन एक हज़ार ऐसे चतुर्युगों के बराबर है और रात भी उतनी ही लंबी है। यह वर्णन यह समझाने के लिए है कि मानवीय दृष्टि से जो 'दीर्घकाल' लगता है, वह भी ब्रह्मांडीय काल के सामने अत्यंत छोटा है।


श्लोक 8.18

वक्ता: श्रीकृष्ण

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥8.18॥

avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyahar-āgame / rātryāgame pralīyante tatraivāvyakta-sanjñake

हिंदी अनुवाद: ब्रह्मा के दिन के आरंभ में अव्यक्त से समस्त प्राणी प्रकट होते हैं और रात के आरंभ में वे सब उसी अव्यक्त में लीन हो जाते हैं।

भावार्थ: यहाँ सृष्टि और प्रलय का क्रम बताया गया है। 'अव्यक्त' का अर्थ है — वह सूक्ष्म अप्रकट अवस्था जिसमें सृष्टि का बीज रहता है। ब्रह्मा के दिन के आने पर सब कुछ प्रकट होता है और रात के आने पर सब कुछ उसी अव्यक्त में समा जाता है। यह सृष्टि का अनंत चक्र है जो ब्रह्मा के दिन-रात के साथ चलता रहता है।


श्लोक 8.19

वक्ता: श्रीकृष्ण

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥8.19॥

bhūta-grāmaḥ sa evāyaṁ bhūtvā bhūtvā pralīyate / rātryāgame ’vaśhaḥ pārtha prabhavatyahar-āgame

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! यही प्राणिसमुदाय बार-बार उत्पन्न होकर ब्रह्मा के दिन में प्रकट होता है और रात के आने पर परवश होकर लीन हो जाता है।

भावार्थ: 'भूतग्रामः' अर्थात् प्राणियों का समूह। 'अवशः' अर्थात् परवश — अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि प्रकृति के नियम के अधीन। श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह सारा प्राणिजगत बार-बार जन्म लेता और लीन होता रहता है — इसमें जीव की अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं, वह इस महाचक्र में बँधा है। यह वर्णन पिछले श्लोक की बात को और स्पष्ट करता है।

आज के जीवन में: जो इस जन्म-मृत्यु के चक्र को समझ लेता है, वह उससे ऊपर उठने का मार्ग खोजने की प्रेरणा पाता है।


श्लोक 8.20

वक्ता: श्रीकृष्ण

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥8.20॥

paras tasmāt tu bhāvo ’nyo ’vyakto ’vyaktāt sanātanaḥ / yaḥ sa sarveṣhu bhūteṣhu naśhyatsu na vinaśhyati

हिंदी अनुवाद: परंतु उस अव्यक्त से भी परे एक और सनातन अव्यक्त भाव है, जो समस्त प्राणियों के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ दो अव्यक्तों का भेद करते हैं। पहला अव्यक्त वह है जिसमें सृष्टि लीन होती और जिससे प्रकट होती है — वह भी परिवर्तनशील चक्र का हिस्सा है। दूसरा अव्यक्त उससे भी परे है — 'परस्तस्मात्' — और वह 'सनातन' अर्थात् अनादि-अनंत है। महाप्रलय में जब सब कुछ नष्ट हो जाता है, तब भी यह परम तत्त्व अविनाशी बना रहता है। यही परब्रह्म है।

आज के जीवन में: संसार में सब कुछ बदलता रहता है, पर जो भीतर का शाश्वत तत्त्व है, वह कभी नष्ट नहीं होता — उसी की पहचान आत्मज्ञान है।


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