भगवद्गीता अध्याय 8, श्लोक 21–28 | अक्षरब्रह्मयोग | अर्थ सहित
अध्याय आठ के पूर्व भागों में श्रीकृष्ण ने ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म और अंतकाल की भावना का वर्णन किया था। अब इस अंतिम खंड में वे परमधाम की महिमा, उसे पाने का उपाय, और शरीर छोड़ने के दो मार्गों — शुक्ल और कृष्ण — का विस्तार से वर्णन करते हैं। अंत में वे अर्जुन को यह ज्ञान जानकर सदा योगयुक्त रहने की प्रेरणा देते हैं।
श्लोक 8.21
वक्ता: श्रीकृष्ण
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥8.21॥
avyakto ’kṣhara ityuktas tam āhuḥ paramāṁ gatim / yaṁ prāpya na nivartante tad dhāma paramaṁ mama
हिंदी अनुवाद: जिसे अव्यक्त और अक्षर कहा गया है, उसी को परमगति कहते हैं। जिसे प्राप्त होने पर जीव फिर इस संसार में लौटकर नहीं आते, वही मेरा परमधाम है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को उस सर्वोच्च सत्ता का परिचय दे रहे हैं जो इंद्रियों और मन की पहुँच से परे है। 'अव्यक्त' अर्थात् जो प्रकट नहीं होता, और 'अक्षर' अर्थात् जो कभी नष्ट नहीं होता — यही परमात्मा का स्वरूप है। यह केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक ऐसी अवस्था है जहाँ पहुँचने के बाद जन्म-मरण का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता है। श्रीकृष्ण इसे अपना 'परमधाम' कहकर उसकी सर्वोच्चता स्पष्ट करते हैं।
आज के जीवन में: जो सत्य अविनाशी और अप्रकट है, उसी की ओर जीवन की यात्रा को मोड़ना ही सबसे बड़ा लक्ष्य है।
श्लोक 8.22
वक्ता: श्रीकृष्ण
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥8.22॥
puruṣhaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyas tvananyayā / yasyāntaḥ-sthāni bhūtāni yena sarvam idaṁ tatam
हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! जिस परम पुरुष के भीतर सभी प्राणी स्थित हैं और जिससे यह सारा संसार व्याप्त है, वह परमात्मा केवल अनन्य भक्ति से प्राप्त होता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ उस परम पुरुष का वर्णन करते हैं जो सर्वव्यापी है — सभी प्राणी उसके भीतर हैं और वह सब में समाया हुआ है। 'अनन्यभक्ति' का अर्थ है ऐसी भक्ति जिसमें किसी और का आश्रय न हो, केवल परमात्मा ही एकमात्र आधार हो। इतने विराट और सर्वव्यापी परमात्मा को पाने का मार्ग कोई जटिल साधना नहीं, बल्कि हृदय की निष्कपट और एकनिष्ठ भक्ति है — यह श्रीकृष्ण का आश्वासन है।
आज के जीवन में: परमात्मा को पाने के लिए किसी बाहरी साधन से अधिक आवश्यक है — हृदय की एकनिष्ठ और अविभाजित भक्ति।
श्लोक 8.23
वक्ता: श्रीकृष्ण
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥8.23॥
yatra kāle tvanāvṛittim āvṛittiṁ chaiva yoginaḥ / prayātā yānti taṁ kālaṁ vakṣhyāmi bharatarṣhabha
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं उन दोनों मार्गों का वर्णन करूँगा, जिनसे शरीर छोड़कर गए योगी — एक में लौटते नहीं और दूसरे में लौट आते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अब एक नए विषय की ओर मुड़ते हैं — मृत्यु के पश्चात् की गति। वे अर्जुन को बताते हैं कि शरीर छोड़ने के दो मार्ग हैं। एक मार्ग से जाने वाले को पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता — यह 'अनावृत्ति' है। दूसरे मार्ग से जाने वाला पुनः संसार में लौट आता है — यह 'आवृत्ति' है। यह श्लोक अगले दो श्लोकों की भूमिका है जिनमें इन दोनों मार्गों का विस्तार होगा।
श्लोक 8.24
वक्ता: श्रीकृष्ण
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥8.24॥
agnir jyotir ahaḥ śhuklaḥ ṣhaṇ-māsā uttarāyaṇam / tatra prayātā gachchhanti brahma brahma-vido janāḥ
हिंदी अनुवाद: अग्नि, प्रकाश, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छः महीने — इस मार्ग से शरीर छोड़कर जाने वाले ब्रह्मज्ञानी पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ: यह 'शुक्ल मार्ग' या 'देवयान' का वर्णन है। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण — ये सब प्रकाश और ऊर्ध्वगति के प्रतीक हैं। इस मार्ग से जाने वाले 'ब्रह्मविद्' अर्थात् ब्रह्म को जानने वाले पुरुष हैं। इस मार्ग की परिणति ब्रह्म की प्राप्ति है और फिर संसार में लौटना नहीं होता। यह मार्ग ज्ञान और साधना की उच्च अवस्था का सूचक है।
श्लोक 8.25
वक्ता: श्रीकृष्ण
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥8.25॥
dhūmo rātris tathā kṛiṣhṇaḥ ṣhaṇ-māsā dakṣhiṇāyanam / tatra chāndramasaṁ jyotir yogī prāpya nivartate
हिंदी अनुवाद: धुआँ, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छः महीने — इस मार्ग से जाने वाला योगी चंद्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर पुनः लौट आता है।
भावार्थ: यह 'कृष्ण मार्ग' या 'पितृयान' का वर्णन है। धुआँ, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन — ये अंधकार और अधोगति के प्रतीक हैं। इस मार्ग से जाने वाला सकाम साधक चंद्रलोक तक पहुँचता है, वहाँ अपने पुण्यों का फल भोगता है और फिर पुनः पृथ्वी पर जन्म लेता है। 'चान्द्रमसं ज्योतिः' अर्थात् चंद्रमा की ज्योति — यह एक अस्थायी फल का संकेत है।
श्लोक 8.26
वक्ता: श्रीकृष्ण
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः ॥8.26॥
śhukla-kṛiṣhṇe gatī hyete jagataḥ śhāśhvate mate / ekayā yātyanāvṛittim anyayāvartate punaḥ
हिंदी अनुवाद: शुक्ल और कृष्ण — ये दोनों मार्ग जगत में अनादिकाल से चले आ रहे हैं। एक से जाने वाला लौटता नहीं, दूसरे से जाने वाला पुनः लौट आता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि ये दोनों मार्ग — शुक्ल और कृष्ण — सृष्टि के आरंभ से ही विद्यमान हैं, ये कोई नई व्यवस्था नहीं है। 'शाश्वते मते' अर्थात् इन्हें शाश्वत माना गया है। एक मार्ग मुक्ति की ओर ले जाता है और दूसरा पुनर्जन्म की ओर। यह श्लोक पिछले दो श्लोकों का सार है और यह बताता है कि मनुष्य की साधना और भाव ही निर्धारित करते हैं कि वह किस मार्ग का पात्र बनता है।
श्लोक 8.27
वक्ता: श्रीकृष्ण
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥8.27॥
naite sṛitī pārtha jānan yogī muhyati kaśhchana / tasmāt sarveṣhu kāleṣhu yoga-yukto bhavārjuna
हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोह को प्राप्त नहीं होता। इसलिए तू सदा योगयुक्त हो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ इस पूरे विवेचन का व्यावहारिक निष्कर्ष देते हैं। जो साधक इन दोनों मार्गों का ज्ञान रखता है, वह भटकता नहीं — उसे पता है कि किस दिशा में जाना है। 'मुह्यति' अर्थात् मोहित होना — यह ज्ञान मोह को दूर करता है। इसीलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को आदेश देते हैं कि वह 'सर्वेषु कालेषु' अर्थात् हर समय योगयुक्त रहे — न केवल संकट में, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति जीवन के सत्य को समझ लेता है, वह किसी भी परिस्थिति में मोह और भ्रम से नहीं डिगता।
श्लोक 8.28
वक्ता: श्रीकृष्ण
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥8.28॥
vedeṣhu yajñeṣhu tapaḥsu chaiva / dāneṣhu yat puṇya-phalaṁ pradiṣhṭam / atyeti tat sarvam idaṁ viditvā / yogī paraṁ sthānam upaiti chādyam
हिंदी अनुवाद: इस रहस्य को जानकर योगी वेदों, यज्ञों, तपों और दानों से मिलने वाले सभी पुण्यफलों को पार कर जाता है और आदि एवं परम स्थान — परमात्मा — को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ: अध्याय के अंतिम श्लोक में श्रीकृष्ण इस ज्ञान की महत्ता बताते हैं। वेद-पाठ, यज्ञ, तप और दान — ये सब श्रेष्ठ कर्म हैं और इनके पुण्यफल भी महान हैं। किंतु जो योगी शुक्ल-कृष्ण मार्ग के इस रहस्य को जानकर परमात्मा में स्थित हो जाता है, वह इन सब फलों से भी ऊपर उठ जाता है। 'आद्यम् परं स्थानम्' अर्थात् वह आदि और सर्वोच्च स्थान — परमात्मा — जो सबसे पहले था और सदा रहेगा।
आज के जीवन में: बाहरी धार्मिक कर्मों के फल सीमित होते हैं; परमात्मा का ज्ञान और उसमें स्थिरता उन सब फलों से परे ले जाती है।
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