भगवद्गीता अध्याय 9, श्लोक 1–10 | राजविद्याराजगुह्ययोग | अर्थ सहित
अष्टम अध्याय में श्रीकृष्ण ने अक्षर ब्रह्म, मृत्यु के समय की स्थिति और दो मार्गों — देवयान और पितृयान — का विवेचन किया था। अब नवम अध्याय में वे अर्जुन को सबसे गोपनीय और सर्वश्रेष्ठ ज्ञान देने का संकल्प करते हैं — यह ज्ञान है परमात्मा का अपनी सृष्टि से संबंध, जिसमें वे सर्वव्यापी होते हुए भी किसी से बँधे नहीं हैं।
श्लोक 9.1
वक्ता: श्रीकृष्ण
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥9.1॥
śhrī bhagavān uvācha / idaṁ tu te guhyatamaṁ pravakṣhyāmyanasūyave / jñānaṁ vijñāna-sahitaṁ yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — जो दोषदृष्टि से रहित है, ऐसे तुझे मैं यह अत्यंत गोपनीय ज्ञान, अनुभव-सहित, भली-भाँति बताऊँगा, जिसे जानकर तू अशुभ अर्थात् जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाएगा।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि यह ज्ञान 'गुह्यतमम्' — सबसे अधिक गोपनीय — है। वे यह ज्ञान इसलिए दे रहे हैं क्योंकि अर्जुन 'अनसूयवे' — दोषदृष्टि या ईर्ष्या से रहित — है। यहाँ 'विज्ञानसहितम्' का अर्थ है केवल शास्त्रीय ज्ञान नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव से युक्त ज्ञान। इस ज्ञान का फल है 'अशुभ' से मुक्ति — अर्थात् संसार के जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा। यह अध्याय का प्रारंभिक वचन है जिसमें गुरु शिष्य की पात्रता देखकर सर्वोच्च ज्ञान देने का संकल्प करते हैं।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति दोषदृष्टि छोड़कर खुले मन से सीखता है, उसे ही गहरा ज्ञान प्राप्त होता है।
श्लोक 9.2
वक्ता: श्रीकृष्ण
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥9.2॥
rāja-vidyā rāja-guhyaṁ pavitram idam uttamam / pratyakṣhāvagamaṁ dharmyaṁ su-sukhaṁ kartum avyayam
हिंदी अनुवाद: यह ज्ञान सभी विद्याओं का राजा और सभी रहस्यों का राजा है; यह परम पवित्र, श्रेष्ठ, प्रत्यक्ष फल देने वाला, धर्म के अनुकूल, अविनाशी और करने में अत्यंत सुगम है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण इस ज्ञान की महिमा बताते हैं। 'राजविद्या' — विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ, 'राजगुह्यम्' — रहस्यों में सर्वोपरि। यह 'पवित्रम्' — शुद्ध करने वाला — है। 'प्रत्यक्षावगमम्' का अर्थ है कि इसका फल अनुमान पर नहीं, सीधे अनुभव पर आधारित है। यह 'धर्म्यम्' — धर्म के अनुकूल — है और 'अव्ययम्' — कभी नष्ट न होने वाला। इसे प्राप्त करना 'सुसुखम्' अर्थात् अत्यंत सुगम है। इस प्रकार श्रीकृष्ण इस ज्ञान को सर्वांगीण श्रेष्ठता से विभूषित करते हैं।
आज के जीवन में: जो ज्ञान भीतर से शुद्ध करे, प्रत्यक्ष अनुभव दे और जीवन को सहज बनाए — वही सच्चा ज्ञान है।
श्लोक 9.3
वक्ता: श्रीकृष्ण
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥9.3॥
aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa / aprāpya māṁ nivartante mṛityu-samsāra-vartmani
हिंदी अनुवाद: हे परंतप! इस धर्म में जिन मनुष्यों की श्रद्धा नहीं है, वे मुझे प्राप्त किए बिना मृत्युरूप संसार के मार्ग में बार-बार लौटते रहते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ 'परंतप' — शत्रुओं को तपाने वाले — कहकर अर्जुन को संबोधित करते हैं। वे बताते हैं कि इस ज्ञान की महिमा जानने के बाद भी जो लोग 'अश्रद्दधानाः' — श्रद्धाहीन — रहते हैं, वे परमात्मा को प्राप्त नहीं कर पाते। 'मृत्युसंसारवर्त्मनि' का अर्थ है जन्म और मृत्यु के चक्र का मार्ग। श्रद्धा के बिना यह ज्ञान ग्रहण नहीं होता और बिना ज्ञान के मनुष्य संसार के आवागमन में ही भटकता रहता है।
आज के जीवन में: श्रद्धा के बिना कोई भी ज्ञान जीवन में उतर नहीं सकता।
श्लोक 9.4
वक्ता: श्रीकृष्ण
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥9.4॥
mayā tatam idaṁ sarvaṁ jagad avyakta-mūrtinā / mat-sthāni sarva-bhūtāni na chāhaṁ teṣhvavasthitaḥ
हिंदी अनुवाद: यह सारा जगत् मेरे निराकार स्वरूप से व्याप्त है; सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं, परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अपने स्वरूप का एक गहरा रहस्य प्रकट करते हैं। 'अव्यक्तमूर्तिना' — निराकार रूप से — वे सारे जगत् में व्याप्त हैं। सभी प्राणी उनमें स्थित हैं, जैसे सब कुछ किसी आधार पर टिका हो। किंतु वे स्वयं उन प्राणियों में सीमित नहीं हैं। यह विरोधाभास जैसा लगने वाला सत्य परमात्मा की असीमता को दर्शाता है — वे सबके आधार हैं, फिर भी किसी के भीतर बँधे नहीं। यह श्लोक परमात्मा की सर्वव्यापकता और उनकी अतीन्द्रिय स्वतंत्रता दोनों को एक साथ व्यक्त करता है।
आज के जीवन में: परमात्मा सब में हैं, फिर भी किसी से बँधे नहीं — यह उनकी असीम प्रकृति का संकेत है।
श्लोक 9.5
वक्ता: श्रीकृष्ण
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥9.5॥
na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram / bhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ
हिंदी अनुवाद: वे प्राणी भी वास्तव में मुझमें स्थित नहीं हैं — मेरी इस ईश्वरीय योग-शक्ति को देखो! मेरा स्वरूप सभी प्राणियों को उत्पन्न करने वाला और उनका पालन-पोषण करने वाला है, फिर भी वह उनमें स्थित नहीं है।
भावार्थ: इस श्लोक में श्रीकृष्ण 'योगमैश्वरम्' — ईश्वरीय योग-सामर्थ्य — को देखने का आग्रह करते हैं। 'भूतभृत्' — सभी प्राणियों का भरण-पोषण करने वाला — और 'भूतभावनः' — सभी को उत्पन्न करने वाला — होते हुए भी वे 'न च भूतस्थः' — प्राणियों में स्थित नहीं। यह ईश्वर की अद्भुत शक्ति है कि वे सबके कारण और आधार हैं, फिर भी किसी में आसक्त या सीमित नहीं। यह सामर्थ्य सामान्य बुद्धि से परे है, इसीलिए इसे 'देखने' का आह्वान किया गया है।
आज के जीवन में: जो सबका पालन करते हुए भी किसी से न बँधे, वही सच्ची निर्लिप्तता है।
श्लोक 9.6
वक्ता: श्रीकृष्ण
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥9.6॥
yathākāśha-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahān / tathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānītyupadhāraya
हिंदी अनुवाद: जैसे सर्वत्र विचरने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं — ऐसा जानो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण एक सुंदर उपमा देते हैं। वायु सर्वत्र गतिशील है, विशाल है, फिर भी वह आकाश में ही रहती है — आकाश उसे धारण करता है, पर वायु आकाश को सीमित नहीं करती। इसी प्रकार सभी प्राणी परमात्मा में स्थित हैं — वे उनके आधार हैं — परंतु परमात्मा उन प्राणियों से परिच्छिन्न या सीमित नहीं होते। यह उपमा पिछले दो श्लोकों के कठिन तत्त्व को सहज रूप से समझाती है। 'उपधारय' — इसे भली-भाँति धारण करो, समझो।
आज के जीवन में: जैसे आकाश वायु को थामे रहता है पर उससे प्रभावित नहीं होता, वैसे ही परमात्मा सबका आधार होते हुए भी निर्लिप्त हैं।
श्लोक 9.7
वक्ता: श्रीकृष्ण
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥9.7॥
sarva-bhūtāni kaunteya prakṛitiṁ yānti māmikām / kalpa-kṣhaye punas tāni kalpādau visṛijāmyaham
हिंदी अनुवाद: हे कुंतीनंदन! कल्प के अंत में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें फिर से रचता हूँ।
भावार्थ: श्रीकृष्ण सृष्टि के महाचक्र का वर्णन करते हैं। 'कल्प' एक विशाल कालखंड है। 'कल्पक्षये' — कल्प के अंत में — सभी प्राणी 'मामिकाम् प्रकृतिम्' — मेरी अपनी प्रकृति में — समा जाते हैं। और 'कल्पादौ' — नए कल्प के आरंभ में — वे फिर से प्रकट होते हैं। यह सृष्टि और प्रलय का अनंत क्रम परमात्मा की शक्ति से ही चलता है। यह श्लोक बताता है कि सृष्टि कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि परमात्मा की एक नियमबद्ध प्रक्रिया है।
श्लोक 9.8
वक्ता: श्रीकृष्ण
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥9.8॥
prakṛitiṁ svām avaṣhṭabhya visṛijāmi punaḥ punaḥ / bhūta-grāmam imaṁ kṛitsnam avaśhaṁ prakṛiter vaśhāt
हिंदी अनुवाद: अपनी प्रकृति को वश में करके मैं इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदाय को, जो प्रकृति के वश में होने से परतंत्र है, बार-बार रचता हूँ।
भावार्थ: 'प्रकृतिं स्वाम् अवष्टभ्य' — अपनी प्रकृति को वश में करके — यह पद महत्त्वपूर्ण है। परमात्मा प्रकृति के अधीन नहीं, बल्कि प्रकृति उनके अधीन है। सभी प्राणी 'अवशम्' — परतंत्र — हैं, क्योंकि वे 'प्रकृतेर्वशात्' — प्रकृति के वश में — हैं। परंतु परमात्मा स्वयं प्रकृति के स्वामी हैं। वे इस सम्पूर्ण 'भूतग्राम' — प्राणिसमुदाय — को बार-बार रचते हैं। यह श्लोक ईश्वर की सर्वोच्च स्वतंत्रता और प्रकृति पर उनके नियंत्रण को स्पष्ट करता है।
श्लोक 9.9
वक्ता: श्रीकृष्ण
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥9.9॥
na cha māṁ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya / udāsīna-vad āsīnam asaktaṁ teṣhu karmasu
हिंदी अनुवाद: हे धनंजय! उन सृष्टि-रचना आदि कर्मों में अनासक्त और उदासीन की भाँति रहते हुए वे कर्म मुझे नहीं बाँधते।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं। वे सृष्टि की रचना करते हैं, फिर भी उन कर्मों का फल उन्हें नहीं बाँधता। इसका कारण है 'उदासीनवत्' — उदासीन की भाँति — और 'असक्तम्' — आसक्तिरहित — रहना। 'धनंजय' — अर्जुन को संबोधन। यह श्लोक कर्मयोग का सार है — कर्म करते हुए भी फल में आसक्ति न रखना। परमात्मा स्वयं इसके आदर्श उदाहरण हैं। जो कर्ता भाव और आसक्ति से मुक्त है, उसे कर्म नहीं बाँधते।
आज के जीवन में: कर्म करते हुए भी फल में आसक्ति न रखें — यही कर्मयोग का मूल है, जिसे परमात्मा स्वयं जीते हैं।
श्लोक 9.10
वक्ता: श्रीकृष्ण
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥9.10॥
mayādhyakṣheṇa prakṛitiḥ sūyate sa-charācharam / hetunānena kaunteya jagad viparivartate
हिंदी अनुवाद: मेरी अध्यक्षता में प्रकृति समस्त चराचर जगत् की रचना करती है। हे कुंतीनंदन! इसी कारण से यह जगत् विविध प्रकार से परिवर्तित होता रहता है।
भावार्थ: 'मया अध्यक्षेण' — मेरी अध्यक्षता में — अर्थात् परमात्मा के निरीक्षण और नियंत्रण में। प्रकृति स्वयं 'सचराचरम्' — चर और अचर, गतिशील और स्थिर — सम्पूर्ण जगत् को रचती है। 'कुंतीनंदन' — अर्जुन को संबोधन। 'जगत् विपरिवर्तते' — जगत् का निरंतर परिवर्तन — इसी कारण होता है। परमात्मा स्वयं कर्ता नहीं बनते, किंतु उनकी उपस्थिति और अध्यक्षता से ही प्रकृति की समस्त क्रियाएँ संभव होती हैं। यह श्लोक परमात्मा और प्रकृति के संबंध को स्पष्ट करता है।
आज के जीवन में: संसार की हर गतिविधि के पीछे एक परम सत्ता की अध्यक्षता है — यह जानकर कर्म में विनम्रता आती है।
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