भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 9, श्लोक 11–20 | राजविद्याराजगुह्ययोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·9 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 9, श्लोक 11–20 | राजविद्याराजगुह्ययोग | अर्थ सहित

अध्याय नौ के पहले भाग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह राजविद्या और राजगुह्य बताई कि समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं, फिर भी वे किसी से बँधे नहीं। अब इस दूसरे भाग में वे स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य-देह में आए हुए उन्हें जो मूढ़ साधारण मनुष्य समझते हैं, वे भटक जाते हैं; और जो महात्मा उनके वास्तविक स्वरूप को पहचानकर अनन्य भाव से भजते हैं, वे किस प्रकार उपासना करते हैं। साथ ही श्रीकृष्ण अपनी सर्वव्यापकता का विस्तार से वर्णन करते हैं और सकाम उपासकों की गति भी बताते हैं।

श्लोक 9.11

वक्ता: श्रीकृष्ण

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥9.11॥

avajānanti māṁ mūḍhā mānuṣhīṁ tanum āśhritam / paraṁ bhāvam ajānanto mama bhūta-maheśhvaram

हिंदी अनुवाद: मूढ़ लोग मुझे मनुष्य-शरीर में आया हुआ देखकर साधारण मनुष्य मान लेते हैं और मेरी अवज्ञा करते हैं। वे मेरे उस परम भाव को नहीं जानते जो समस्त प्राणियों का महान् ईश्वर है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जब वे मनुष्य-देह धारण करके संसार में आते हैं, तब अज्ञानी लोग उनकी बाहरी मानव-आकृति देखकर उन्हें सामान्य मनुष्य समझ बैठते हैं। 'परं भावम्' अर्थात् उनका वह उच्चतम स्वरूप जो समस्त प्राणियों का महान् ईश्वर है, उसे ये लोग नहीं पहचान पाते। यही अज्ञान उनकी सबसे बड़ी भूल है। जो दिखता है उसी को सब कुछ मान लेना और उसके पीछे की दिव्य सत्ता को न देखना — यही मूढ़ता है।

आज के जीवन में: किसी भी महान् व्यक्ति या सत्य को केवल बाहरी रूप से नहीं, उसके गहरे स्वभाव और तत्त्व से पहचानने का प्रयास करें।


श्लोक 9.12

वक्ता: श्रीकृष्ण

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥9.12॥

moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥ / rākṣhasīm āsurīṁ chaiva prakṛitiṁ mohinīṁ śhritāḥ

हिंदी अनुवाद: ऐसे अविवेकी लोगों की सारी आशाएँ, सारे कर्म और सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है। वे आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृति के आश्रय में रहते हैं।

भावार्थ: जो लोग श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानते, उनकी दशा का वर्णन यहाँ किया गया है। 'मोघाशा' अर्थात् व्यर्थ आशाएँ, 'मोघकर्माणः' अर्थात् निष्फल कर्म, और 'मोघज्ञानाः' अर्थात् व्यर्थ ज्ञान — ये तीनों उनके जीवन की विशेषता बन जाते हैं। ऐसे लोग आसुरी और राक्षसी प्रकृति के वशीभूत होकर मोह में डूबे रहते हैं। उनका कोई भी प्रयास सच्चा फल नहीं देता क्योंकि उनकी नींव ही गलत है।

आज के जीवन में: जिस कार्य की जड़ में सत्य और विवेक न हो, उसका परिणाम चाहे कितना भी बड़ा दिखे, अंततः व्यर्थ ही सिद्ध होता है।


श्लोक 9.13

वक्ता: श्रीकृष्ण

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥9.13॥

mahātmānas tu māṁ pārtha daivīṁ prakṛitim āśhritāḥ / bhajantyananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! दैवी प्रकृति के आश्रय में रहने वाले महात्मा लोग मुझे समस्त प्राणियों का आदि और अविनाशी जानकर अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।

भावार्थ: पिछले दो श्लोकों में मूढ़ों का वर्णन था; अब श्रीकृष्ण इसके विपरीत महात्माओं का चित्र प्रस्तुत करते हैं। 'दैवीं प्रकृतिम्' अर्थात् दिव्य स्वभाव के आश्रित ये महात्मा जानते हैं कि श्रीकृष्ण 'भूतादिम्' — समस्त प्राणियों के आदि स्रोत — और 'अव्ययम्' — कभी न घटने वाले, अविनाशी — हैं। इस ज्ञान के साथ वे अनन्य मन से, अर्थात् मन को किसी और ओर न भटकाते हुए, केवल उन्हीं का भजन करते हैं।

आज के जीवन में: जब हम किसी सत्य को गहराई से जान लेते हैं, तो हमारी उपासना और समर्पण स्वाभाविक रूप से एकाग्र और निष्कपट हो जाता है।


श्लोक 9.14

वक्ता: श्रीकृष्ण

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥9.14॥

satataṁ kīrtayanto māṁ yatantaśh cha dṛiḍha-vratāḥ / namasyantaśh cha māṁ bhaktyā nitya-yuktā upāsate

हिंदी अनुवाद: वे नित्य मुझमें लगे हुए, दृढ़ व्रत धारण किए, लगन से साधना करते हुए, भक्तिपूर्वक कीर्तन करते और नमस्कार करते हुए निरंतर मेरी उपासना करते हैं।

भावार्थ: यहाँ महात्माओं की उपासना के व्यावहारिक रूप का वर्णन है। 'नित्ययुक्ताः' अर्थात् जो सदा ईश्वर से जुड़े रहते हैं, 'दृढव्रताः' अर्थात् जिनके संकल्प अटल हैं — ऐसे भक्त तीन प्रकार से उपासना करते हैं: कीर्तन द्वारा मुख से स्तुति, यत्न द्वारा शरीर और मन से साधना, और नमस्कार द्वारा विनम्र समर्पण। यह उपासना किसी एक अवसर की नहीं, बल्कि निरंतर और जीवन के हर क्षण में होती है।

आज के जीवन में: सच्ची उपासना केवल मंदिर तक सीमित नहीं; जब जीवन का हर कार्य श्रद्धा और दृढ़ संकल्प के साथ किया जाए, तभी वह सच्ची साधना बनती है।


श्लोक 9.15

वक्ता: श्रीकृष्ण

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥9.15॥

jñāna-yajñena chāpyanye yajanto mām upāsate / ekatvena pṛithaktvena bahudhā viśhvato-mukham

हिंदी अनुवाद: दूसरे साधक ज्ञानयज्ञ के द्वारा मेरी उपासना करते हैं — कोई मुझे अपने से अभिन्न मानकर, कोई मुझे अलग मानकर, और कोई अनेक रूपों में सर्वत्र मुख वाले मेरे विराट् स्वरूप की उपासना करते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि उपासना के मार्ग एक नहीं, अनेक हैं। 'ज्ञानयज्ञ' अर्थात् ज्ञान को ही यज्ञ मानकर की गई उपासना। 'एकत्वेन' — जो साधक स्वयं को ईश्वर से अभिन्न अनुभव करते हैं; 'पृथक्त्वेन' — जो सेव्य-सेवक भाव से उपासना करते हैं; और 'बहुधा विश्वतोमुखम्' — जो इस सारे संसार को ही ईश्वर का विराट् रूप मानकर उसकी सेवा करते हैं। सभी मार्ग अंततः उसी एक की ओर जाते हैं।

आज के जीवन में: ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग अनेक हैं; अपनी प्रकृति और समझ के अनुसार जो मार्ग सच्चा लगे, उसे श्रद्धा से अपनाना ही सच्ची साधना है।


श्लोक 9.16

वक्ता: श्रीकृष्ण

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्।
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥9.16॥

ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣhadham / mantro ’ham aham evājyam aham agnir ahaṁ hutam

हिंदी अनुवाद: मैं ही क्रतु हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही पितरों को दी जाने वाली स्वधा हूँ, मैं ही औषधि हूँ; मैं ही मंत्र हूँ, मैं ही घृत हूँ, मैं ही अग्नि हूँ और मैं ही हवन की क्रिया हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अपनी सर्वव्यापकता का विस्तार करते हुए यज्ञ के प्रत्येक अंग में स्वयं को देखने को कहते हैं। 'क्रतु' वैदिक अनुष्ठान है, 'यज्ञ' सामान्य हवन, 'स्वधा' पितरों को दिया जाने वाला अर्पण। मंत्र, घृत, अग्नि और हवन की क्रिया — ये सब यज्ञ के अंग हैं और इन सबमें वे ही हैं। इसका भाव यह है कि जो कुछ भी पवित्र और कल्याणकारी है, वह सब उन्हीं का स्वरूप है।

आज के जीवन में: जब हम किसी भी शुभ कार्य में ईश्वर की उपस्थिति देखने लगते हैं, तो वह कार्य यज्ञ बन जाता है।


श्लोक 9.17

वक्ता: श्रीकृष्ण

पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च ॥9.17॥

pitāham asya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ / vedyaṁ pavitram oṁkāra ṛik sāma yajur eva cha

हिंदी अनुवाद: मैं ही इस जगत् का पिता हूँ, माता हूँ, धाता हूँ और पितामह हूँ; जानने योग्य पवित्र तत्त्व मैं हूँ, ओंकार मैं हूँ और ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।

भावार्थ: इस श्लोक में श्रीकृष्ण पारिवारिक और ज्ञान के क्षेत्र में अपनी सर्वव्यापकता बताते हैं। 'पिता', 'माता', 'धाता' (पालनकर्ता) और 'पितामह' (दादा) — ये सभी संबंध उनमें समाहित हैं, अर्थात् वे ही समस्त जगत् के आधार हैं। 'वेद्यम्' अर्थात् जो जानने योग्य है, वह वे ही हैं। ओंकार और तीनों वेद — ऋक्, साम, यजुः — भी उन्हीं के स्वरूप हैं। ज्ञान का प्रत्येक स्रोत उन्हीं से उद्भूत है।

आज के जीवन में: जो सत्य सभी संबंधों और सभी ज्ञान का आधार है, उसे पहचानना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।


श्लोक 9.18

वक्ता: श्रीकृष्ण

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥9.18॥

gatir bhartā prabhuḥ sākṣhī nivāsaḥ śharaṇaṁ suhṛit / prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṁ nidhānaṁ bījam avyayam

हिंदी अनुवाद: मैं ही गति हूँ, भर्ता हूँ, प्रभु हूँ, साक्षी हूँ, निवास हूँ, आश्रय हूँ और सुहृद् हूँ; मैं ही उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, स्थान हूँ, निधान हूँ और अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।

भावार्थ: यह श्लोक श्रीकृष्ण की सर्वव्यापकता के वर्णन की पराकाष्ठा है। 'गति' अर्थात् अंतिम लक्ष्य, 'भर्ता' अर्थात् पालनकर्ता, 'साक्षी' अर्थात् सब कुछ देखने वाला, 'सुहृद्' अर्थात् बिना किसी स्वार्थ के हित चाहने वाला मित्र। 'प्रभवः' अर्थात् उत्पत्ति का कारण और 'प्रलयः' अर्थात् विनाश का आधार — दोनों वे ही हैं। 'बीजमव्ययम्' अर्थात् वह अविनाशी बीज जिससे सृष्टि का पुनः अंकुरण होता है — वह भी वे ही हैं।

आज के जीवन में: जब हम जान लेते हैं कि जीवन का आरंभ, मध्य और अंत — सब उसी एक सत्ता में है — तो भय और अकेलापन दोनों मिट जाते हैं।


श्लोक 9.19

वक्ता: श्रीकृष्ण

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥9.19॥

tapāmyaham ahaṁ varṣhaṁ nigṛihṇāmyutsṛijāmi cha / amṛitaṁ chaiva mṛityuśh cha sad asach chāham arjuna

हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! मैं ही सूर्य के रूप में तपता हूँ, जल को ग्रहण करता हूँ और वर्षा के रूप में बरसाता हूँ। अमृत और मृत्यु, सत् और असत् — ये सब भी मैं ही हूँ।

भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण प्रकृति के चक्र में अपनी उपस्थिति बताते हैं। सूर्य का ताप, बादलों द्वारा जल का संग्रह और वर्षा — यह पूरा चक्र उन्हीं की शक्ति से चलता है। फिर वे और आगे जाकर कहते हैं कि 'अमृत' अर्थात् जीवन और 'मृत्यु' दोनों वे ही हैं; 'सत्' अर्थात् जो है और 'असत्' अर्थात् जो प्रकट नहीं — वह भी वे ही हैं। इस प्रकार कोई भी वस्तु या अवस्था उनसे बाहर नहीं है।

आज के जीवन में: जब हम प्रकृति के हर परिवर्तन में — चाहे वह जीवन हो या मृत्यु — उसी एक सत्ता का कार्य देखते हैं, तो मन में स्थिरता आती है।


श्लोक 9.20

वक्ता: श्रीकृष्ण

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥9.20॥

trai-vidyā māṁ soma-pāḥ pūta-pāpā / yajñair iṣhṭvā svar-gatiṁ prārthayante / te puṇyam āsādya surendra-lokam / aśhnanti divyān divi deva-bhogān

हिंदी अनुवाद: तीनों वेदों में बताए सकाम अनुष्ठान करने वाले और सोमरस पीने वाले पापरहित मनुष्य यज्ञों द्वारा मेरी उपासना करके स्वर्ग की कामना करते हैं। वे अपने पुण्य के फलस्वरूप इंद्रलोक को प्राप्त करके वहाँ देवताओं के दिव्य भोगों को भोगते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अब सकाम उपासकों का वर्णन करते हैं। 'त्रैविद्याः' अर्थात् तीनों वेदों के ज्ञाता जो यज्ञ और अनुष्ठान करते हैं और 'सोमपाः' अर्थात् सोमरस पीने वाले — ये लोग पापों से शुद्ध होकर इंद्र की उपासना के माध्यम से स्वर्ग की कामना करते हैं। उनकी यह उपासना फलदायी होती है और वे स्वर्ग में दिव्य सुखों को प्राप्त करते हैं। किंतु यह फल सीमित है — इसकी चर्चा अगले श्लोक में होगी।


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