भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 9, श्लोक 21–30 | राजविद्याराजगुह्ययोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·9 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 9, श्लोक 21–30 | राजविद्याराजगुह्ययोग | अर्थ सहित

अध्याय नौ में श्रीकृष्ण अर्जुन को राजविद्या और राजगुह्य का उपदेश दे रहे हैं। इससे पहले उन्होंने सकाम उपासकों की सीमाओं और अपनी सर्वव्यापकता का वर्णन किया था। इस खंड में वे बताते हैं कि सकाम भक्ति से केवल आवागमन मिलता है, जबकि अनन्य भक्ति से वे स्वयं भक्त का योगक्षेम वहन करते हैं — और अंत में यह उद्घोषणा करते हैं कि वे सबमें समान हैं, तथा सच्चे मन से भजन करने वाला कोई भी उन्हें प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 9.21

वक्ता: श्रीकृष्ण

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥9.21॥

te taṁ bhuktvā swarga-lokaṁ viśhālaṁ / kṣhīṇe puṇye martya-lokaṁ viśhanti / evaṁ trayī-dharmam anuprapannā / gatāgataṁ kāma-kāmā labhante

हिंदी अनुवाद: वे उस विशाल स्वर्गलोक के भोगों को भोगकर, पुण्य समाप्त होने पर मृत्युलोक में लौट आते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में बताए सकाम धर्म का आश्रय लेकर भोगों की कामना करने वाले मनुष्य बार-बार आने-जाने को प्राप्त होते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि जो लोग यज्ञ-पूजा केवल स्वर्ग-सुख पाने के लिए करते हैं, वे पुण्य के बल पर स्वर्ग तो पाते हैं, किंतु पुण्य चुकते ही पुनः इस मृत्युलोक में जन्म लेना पड़ता है। 'गतागतम्' का अर्थ है — बार-बार आना-जाना, अर्थात् जन्म-मृत्यु का चक्र। 'कामकामाः' यानी भोगों की इच्छा रखने वाले। सकाम उपासना का फल अस्थायी है — वह मुक्ति नहीं देती, केवल संसार-चक्र को बनाए रखती है।

आज के जीवन में: जो कार्य केवल फल की चाह से किए जाते हैं, उनका फल भी सीमित और क्षणिक होता है — इसलिए निःस्वार्थ भाव से कर्म करना ही स्थायी शांति का मार्ग है।


श्लोक 9.22

वक्ता: श्रीकृष्ण

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥9.22॥

ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate / teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham

हिंदी अनुवाद: जो अनन्य भक्त केवल मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मुझमें निरंतर लगे हुए उन भक्तों का योगक्षेम — अर्थात् जो नहीं मिला उसकी प्राप्ति और जो मिला है उसकी रक्षा — मैं स्वयं वहन करता हूँ।

भावार्थ: यह श्लोक गीता के सबसे आश्वस्त करने वाले वचनों में से एक है। 'अनन्याः' का अर्थ है — जो केवल मुझे ही अपना आश्रय मानते हैं, किसी और की ओर नहीं देखते। 'योगक्षेम' — 'योग' यानी जो वस्तु या स्थिति अभी नहीं है उसे प्राप्त करना, और 'क्षेम' यानी जो प्राप्त है उसकी रक्षा करना। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि ऐसे भक्त की सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों आवश्यकताओं का दायित्व वे स्वयं उठाते हैं।

आज के जीवन में: जो पूर्ण श्रद्धा और समर्पण से ईश्वर पर आश्रित रहता है, उसकी देखभाल ईश्वर स्वयं करते हैं — यह विश्वास ही सच्ची भक्ति की नींव है।


श्लोक 9.23

वक्ता: श्रीकृष्ण

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥9.23॥

ye ’pyanya-devatā-bhaktā yajante śhraddhayānvitāḥ / te ’pi mām eva kaunteya yajantyavidhi-pūrvakam

हिंदी अनुवाद: हे कुंतीनंदन! जो भक्त श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओं का पूजन करते हैं, वे भी वास्तव में मेरा ही पूजन करते हैं — किंतु अविधिपूर्वक, अर्थात् उचित विधि के बिना।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि सभी देवताओं की उपासना का मूल स्रोत वे स्वयं हैं। जो लोग अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे अनजाने में उन्हीं की पूजा कर रहे होते हैं। 'अविधिपूर्वकम्' का अर्थ है — उचित ज्ञान और सही विधि के बिना। इसका आशय यह नहीं कि वह पूजा व्यर्थ है, बल्कि यह है कि उसमें परमतत्त्व की पूर्ण पहचान नहीं होती, इसलिए वह पूर्ण फल नहीं देती।

आज के जीवन में: सभी सच्ची उपासनाएँ उसी एक परमसत्ता की ओर जाती हैं — इसलिए किसी की भी श्रद्धा को तुच्छ नहीं समझना चाहिए।


श्लोक 9.24

वक्ता: श्रीकृष्ण

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥9.24॥

ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha / na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te

हिंदी अनुवाद: क्योंकि मैं ही सभी यज्ञों का भोक्ता और स्वामी हूँ; परंतु वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसीलिए उनका पतन होता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण पिछले श्लोक का कारण स्पष्ट करते हैं। 'भोक्ता' यानी जो यज्ञ का फल ग्रहण करता है, और 'प्रभु' यानी जो उसका स्वामी है — दोनों वे स्वयं हैं। जो उपासक इस तत्त्व को नहीं जानते और देवताओं को स्वतंत्र सत्ता मानकर पूजते हैं, वे पूर्ण फल से वंचित रह जाते हैं और पुनः संसार में लौटते हैं। 'तत्त्वेन' का अर्थ है — यथार्थ रूप से, सत्य को जानकर।

आज के जीवन में: उपासना में श्रद्धा के साथ-साथ सही ज्ञान भी आवश्यक है, तभी वह पूर्ण फल देती है।


श्लोक 9.25

वक्ता: श्रीकृष्ण

यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥9.25॥

yānti deva-vratā devān pitṝīn yānti pitṛi-vratāḥ / bhūtāni yānti bhūtejyā yānti mad-yājino ’pi mām

हिंदी अनुवाद: देवताओं का व्रत लेकर पूजन करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों का पूजन करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूत-प्रेतों की पूजा करने वाले उन्हें प्राप्त होते हैं — और मेरा पूजन करने वाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।

भावार्थ: यह श्लोक एक सरल नियम बताता है — जिसकी उपासना की जाए, उसी को प्राप्त होते हैं। 'देवव्रताः' यानी देवताओं के प्रति समर्पित, 'पितृव्रताः' यानी पितरों के प्रति समर्पित। श्रीकृष्ण यहाँ यह नहीं कह रहे कि अन्य उपासनाएँ गलत हैं, बल्कि यह बता रहे हैं कि जो उन्हें भजता है, वह उनको — परमपद को — प्राप्त होता है, जो सर्वोच्च और स्थायी है।


श्लोक 9.26

वक्ता: श्रीकृष्ण

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥9.26॥

patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati / tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ

हिंदी अनुवाद: जो भक्त पत्र, पुष्प, फल या जल भक्तिपूर्वक मुझे अर्पण करता है, उस शुद्ध अंतःकरण वाले भक्त की भक्तिपूर्वक दी हुई भेंट को मैं स्वीकार करता हूँ।

भावार्थ: यह श्लोक भक्ति की सरलता और सुलभता का उद्घोष है। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि उन्हें बड़े-बड़े यज्ञ या महँगी सामग्री नहीं चाहिए — एक पत्ता, एक फूल, एक फल या थोड़ा जल भी पर्याप्त है, यदि वह भक्तिपूर्वक अर्पित हो। 'प्रयतात्मनः' का अर्थ है — शुद्ध और एकाग्र चित्त वाले का। यहाँ 'अश्नामि' (मैं खाता हूँ) शब्द से उनकी भक्त के प्रति आत्मीयता प्रकट होती है।

आज के जीवन में: ईश्वर को अर्पण की वस्तु नहीं, अर्पण करने वाले का भाव देखना होता है — सच्ची भक्ति में साधन की नहीं, हृदय की शुद्धता की आवश्यकता है।


श्लोक 9.27

वक्ता: श्रीकृष्ण

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥9.27॥

yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat / yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣhva mad-arpaṇam

हिंदी अनुवाद: हे कुंतीपुत्र! तू जो कुछ करे, जो कुछ खाए, जो यज्ञ करे, जो दान दे और जो तप करे — वह सब मुझे अर्पण कर दे।

भावार्थ: यह श्लोक कर्मयोग और भक्तियोग का सुंदर समन्वय है। श्रीकृष्ण अर्जुन को — और सभी साधकों को — यह सरल उपाय बताते हैं कि जीवन की प्रत्येक क्रिया को ईश्वर-अर्पण बना दो। खाना, काम करना, दान देना, तप करना — सब कुछ यदि 'मदर्पणम्' अर्थात् मुझे समर्पित करके किया जाए, तो वह साधारण कर्म भी भक्ति बन जाता है। इससे कर्म में अहंकार और फलासक्ति दोनों समाप्त होती हैं।

आज के जीवन में: जीवन के प्रत्येक कार्य को ईश्वर को अर्पित भाव से करने पर वह कर्म बंधन नहीं बनता, बल्कि मुक्ति का मार्ग बन जाता है।


श्लोक 9.28

वक्ता: श्रीकृष्ण

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥9.28॥

śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ / sannyāsa-yoga-yuktātmā vimukto mām upaiṣhyasi

हिंदी अनुवाद: इस प्रकार सब कुछ मुझे अर्पण करने से तू शुभ और अशुभ फल देने वाले कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाएगा। संन्यासयोग से युक्त चित्त वाला और सब बंधनों से मुक्त हुआ तू मुझे प्राप्त हो जाएगा।

भावार्थ: पिछले श्लोक में दिए उपाय का फल यहाँ बताया गया है। 'शुभाशुभफलैः' — अच्छे कर्मों के फल भी बंधन बनते हैं, क्योंकि वे भी पुनर्जन्म का कारण बनते हैं। जब सब कुछ ईश्वर को अर्पित कर दिया जाए, तो न शुभ का मोह रहता है, न अशुभ का भय। 'संन्यासयोगयुक्तात्मा' का अर्थ है — जिसने फल का त्याग करके कर्म को योग बना लिया है। ऐसा साधक अंततः परमात्मा को प्राप्त होता है।

आज के जीवन में: कर्मों को ईश्वर-अर्पण भाव से करने पर न शुभ का अहंकार रहता है, न अशुभ का बोझ — यही सच्ची मुक्ति का मार्ग है।


श्लोक 9.29

वक्ता: श्रीकृष्ण

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥9.29॥

samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ / ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham

हिंदी अनुवाद: मैं सभी प्राणियों में समान हूँ — न कोई मुझे प्रिय है, न कोई द्वेषी। परंतु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ अपनी समदृष्टि स्पष्ट करते हैं। वे किसी के प्रति पक्षपात नहीं करते — न किसी को विशेष रूप से प्रिय मानते हैं, न किसी से द्वेष। फिर भी जो भक्त उन्हें भजते हैं, उनके साथ एक विशेष आत्मीय संबंध स्थापित हो जाता है — 'ते मयि, अहं तेषु' — वे मुझमें और मैं उनमें। यह संबंध ईश्वर की ओर से नहीं, भक्त की भक्ति की ओर से बनता है — जैसे सूर्य सबके लिए समान है, पर जो उसकी ओर मुड़ता है, उसे प्रकाश मिलता है।

आज के जीवन में: ईश्वर सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हैं — जो उनकी ओर मुड़ता है, वह उन्हें पाता है; यह भेद ईश्वर का नहीं, हमारी भक्ति का है।


श्लोक 9.30

वक्ता: श्रीकृष्ण

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥9.30॥

api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk / sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ

हिंदी अनुवाद: यदि कोई अत्यंत दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भजन करे, तो उसे साधु ही मानना चाहिए — क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय कर लिया है।

भावार्थ: यह श्लोक भक्ति की असाधारण शक्ति का उद्घोष है। 'सुदुराचारः' यानी जिसका आचरण बहुत बुरा रहा हो। 'अनन्यभाक्' यानी जो केवल मुझे ही अपना आश्रय मान ले। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जिस क्षण व्यक्ति ने पूर्ण मन से परमात्मा की शरण लेने का दृढ़ निश्चय कर लिया — 'सम्यग्व्यवसितः' — उसी क्षण से वह साधु की श्रेणी में आ जाता है। भूतकाल के कर्म उसकी इस नई दिशा को नहीं रोक सकते।

आज के जीवन में: कोई भी व्यक्ति अपने अतीत से बड़ा नहीं होता — जिस क्षण मन से ईश्वर की शरण ली जाए, उसी क्षण से नई यात्रा आरंभ हो जाती है।


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