भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 21–30 | सांख्ययोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 21–30 | सांख्ययोग | अर्थ सहित

श्रीकृष्ण ने पहले अर्जुन को बताया कि आत्मा न जन्मती है, न मरती है — वह शाश्वत और अविनाशी है। इस खंड में वे उसी सत्य को और गहराई से समझाते हैं — आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वह किसी भी भौतिक शक्ति से परे है, और इसीलिए शोक करना उचित नहीं।

श्लोक 2.21

वक्ता: श्रीकृष्ण

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥2.21॥

vedāvināśhinaṁ nityaṁ ya enam ajam avyayam / kathaṁ sa puruṣhaḥ pārtha kaṁ ghātayati hanti kam

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जो मनुष्य इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अक्षय जानता है, वह भला किसे मारता है और किसे मरवाता है?

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं — यदि तुम सच में जानते हो कि आत्मा अजन्मा और अविनाशी है, तो फिर 'मैं मार रहा हूँ' या 'मेरे कारण कोई मरेगा' — यह भाव कहाँ से आया? 'अजम्' का अर्थ है जन्मरहित, 'अव्ययम्' का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो। जब आत्मा का न जन्म है, न मृत्यु, तो हत्या या हत्या करवाना — दोनों ही भ्रम हैं। यह प्रश्न अर्जुन के शोक की जड़ पर सीधा प्रहार है।

आज के जीवन में: जब हम किसी के जाने पर अत्यधिक शोक करें, तो यह स्मरण करें कि आत्मा का कोई अंत नहीं होता।


श्लोक 2.22

वक्ता: श्रीकृष्ण

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥2.22॥

vāsānsi jīrṇāni yathā vihāya / navāni gṛihṇāti naro ’parāṇi / tathā śharīrāṇi vihāya jīrṇānya / nyāni sanyāti navāni dehī

हिंदी अनुवाद: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार देही — अर्थात् आत्मा — पुराने शरीरों को छोड़कर नए शरीरों में प्रवेश करती है।

भावार्थ: यह गीता का सबसे प्रसिद्ध रूपक है। 'देही' अर्थात् शरीर में रहने वाली आत्मा। जैसे वस्त्र बदलने से व्यक्ति नहीं बदलता, वैसे ही शरीर बदलने से आत्मा नहीं बदलती। शरीर की मृत्यु केवल एक पुराने वस्त्र का उतरना है। यह उपमा अर्जुन के मन में मृत्यु के प्रति जो भय और शोक है, उसे सरल और स्वाभाविक दृष्टि से देखने में सहायता करती है।

आज के जीवन में: मृत्यु का भय तब कम होता है जब हम समझते हैं कि आत्मा केवल एक शरीर से दूसरे में जाती है, नष्ट नहीं होती।


श्लोक 2.23

वक्ता: श्रीकृष्ण

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥2.23॥

nainaṁ chhindanti śhastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ / na chainaṁ kledayantyāpo na śhoṣhayati mārutaḥ

हिंदी अनुवाद: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ आत्मा की अभेद्यता को चार तत्त्वों — पृथ्वी (शस्त्र), अग्नि, जल और वायु — के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। ये चारों भौतिक जगत की सबसे प्रबल शक्तियाँ हैं, फिर भी इनमें से कोई भी आत्मा को छू नहीं सकती। यह श्लोक बताता है कि आत्मा भौतिक नियमों से सर्वथा परे है — वह किसी भी प्रकृति-जनित परिवर्तन से अप्रभावित रहती है।

आज के जीवन में: संसार की कोई भी विपत्ति या कठिनाई हमारी आत्मा को हानि नहीं पहुँचा सकती — यह विश्वास भीतर से दृढ़ता देता है।


श्लोक 2.24

वक्ता: श्रीकृष्ण

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥2.24॥

achchhedyo ’yam adāhyo ’yam akledyo ’śhoṣhya eva cha / nityaḥ sarva-gataḥ sthāṇur achalo ’yaṁ sanātanaḥ

हिंदी अनुवाद: यह आत्मा काटी नहीं जा सकती, जलाई नहीं जा सकती, गीली नहीं की जा सकती और सुखाई भी नहीं जा सकती; क्योंकि यह नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर स्वभाव वाली और सनातन है।

भावार्थ: पिछले श्लोक में जो बात कही गई, उसका यहाँ कारण दिया गया है। 'सर्वगतः' अर्थात् सर्वत्र व्याप्त, 'स्थाणुः' अर्थात् स्थिर खंभे की तरह अडिग, 'सनातनः' अर्थात् अनादि-अनंत। आत्मा इसलिए अभेद्य है क्योंकि वह किसी एक स्थान या रूप में सीमित नहीं है — वह सर्वत्र है और सदा से है। जो सर्वत्र है, उसे कहाँ से काटा जाए?

आज के जीवन में: आत्मा की सर्वव्यापकता और स्थिरता को जानने से मन में एक गहरी शांति और निर्भयता आती है।


श्लोक 2.25

वक्ता: श्रीकृष्ण

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥2.25॥

avyakto ’yam achintyo ’yam avikāryo ’yam uchyate / tasmādevaṁ viditvainaṁ nānuśhochitum arhasi

हिंदी अनुवाद: यह आत्मा अव्यक्त है — इंद्रियों से दिखती नहीं; अचिन्त्य है — मन-बुद्धि से पूरी तरह समझी नहीं जा सकती; और अविकारी है — इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिए इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

भावार्थ: 'अव्यक्त' अर्थात् जो आँखों से न दिखे, 'अचिन्त्य' अर्थात् जिसे विचार की सीमा में न बाँधा जा सके, 'अविकार्य' अर्थात् जिसमें कोई बदलाव न हो। श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि आत्मा का ज्ञान साधारण इंद्रियों या तर्क से नहीं होता — वह इन सबसे परे है। जब आत्मा इतनी परम है, तो उसके लिए शोक करना ही अज्ञान है।

आज के जीवन में: जो सत्य इंद्रियों और विचार से परे है, उसे जानने की कोशिश करना ही आध्यात्मिक जागरण की शुरुआत है।


श्लोक 2.26

वक्ता: श्रीकृष्ण

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥2.26॥

atha chainaṁ nitya-jātaṁ nityaṁ vā manyase mṛitam / tathāpi tvaṁ mahā-bāho naivaṁ śhochitum arhasi

हिंदी अनुवाद: हे महाबाहो! यदि तुम यह भी मानो कि यह आत्मा बार-बार जन्म लेती है और बार-बार मरती है, तब भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक वैकल्पिक दृष्टिकोण रखते हैं — मान लो कि तुम आत्मा की अमरता में विश्वास नहीं करते, तब भी शोक व्यर्थ है। 'महाबाहो' — बलशाली भुजाओं वाले — यह संबोधन अर्जुन को उनकी शक्ति की याद दिलाता है। यदि जन्म-मृत्यु का चक्र ही सत्य है, तो भी यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है — उस पर शोक करना उचित नहीं।

आज के जीवन में: चाहे हम आत्मा को अमर मानें या न मानें, जीवन-मृत्यु के स्वाभाविक क्रम पर शोक करना व्यर्थ है।


श्लोक 2.27

वक्ता: श्रीकृष्ण

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥2.27॥

jātasya hi dhruvo mṛityur dhruvaṁ janma mṛitasya cha / tasmād aparihārye ’rthe na tvaṁ śhochitum arhasi

हिंदी अनुवाद: जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है। इस अटल सत्य में कोई परिवर्तन संभव नहीं, इसलिए तुम्हें इस विषय में शोक नहीं करना चाहिए।

भावार्थ: 'ध्रुवः' अर्थात् निश्चित, अटल। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जन्म और मृत्यु का यह क्रम एक अपरिहार्य नियम है — इसे कोई टाल नहीं सकता। जो बात अनिवार्य है, उस पर शोक करना बुद्धिमानी नहीं। यह श्लोक व्यावहारिक दृष्टि से भी शोक को निरर्थक सिद्ध करता है — जब परिणाम बदला नहीं जा सकता, तो दुःख किस काम का?

आज के जीवन में: जो बातें हमारे वश में नहीं हैं और जो अटल हैं, उन पर व्यर्थ चिंता करने के बजाय अपने कर्तव्य पर ध्यान देना उचित है।


श्लोक 2.28

वक्ता: श्रीकृष्ण

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥2.28॥

avyaktādīni bhūtāni vyakta-madhyāni bhārata / avyakta-nidhanānyeva tatra kā paridevanā

हिंदी अनुवाद: हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे, बीच में प्रकट दिखते हैं, और मृत्यु के बाद फिर अप्रकट हो जाते हैं — तो फिर इसमें शोक की क्या बात है?

भावार्थ: 'अव्यक्त' अर्थात् जो प्रकट न हो, जो दिखाई न दे। श्रीकृषण बताते हैं कि प्रकट अवस्था — अर्थात् यह जीवन — केवल एक बीच की स्थिति है। इससे पहले भी प्राणी था, इसके बाद भी रहेगा — बस दिखना बंद हो जाएगा। जो पहले से था और बाद में भी रहेगा, उसके थोड़े समय के लिए न दिखने पर इतना शोक क्यों? यह दृष्टि शोक को स्वाभाविक रूप से कम करती है।

आज के जीवन में: जीवन एक लंबी यात्रा का छोटा-सा दृश्य भाग है — यह समझ मन को विशाल और शांत बनाती है।


श्लोक 2.29

वक्ता: श्रीकृष्ण

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥2.29॥

āśhcharya-vat paśhyati kaśhchid enan / āśhcharya-vad vadati tathaiva chānyaḥ / āśhcharya-vach chainam anyaḥ śhṛiṇoti / śhrutvāpyenaṁ veda na chaiva kaśhchit

हिंदी अनुवाद: कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह इसका वर्णन करता है, और कोई आश्चर्य की तरह इसे सुनता है — फिर भी सुनने के बाद भी कोई इसे वास्तव में नहीं जान पाता।

भावार्थ: 'आश्चर्यवत्' — आश्चर्य के समान। श्रीकृष्ण यहाँ आत्मा की दुर्बोधता को स्वीकार करते हैं। आत्मा का विषय इतना गहरा है कि कोई इसे देखकर, कोई सुनकर, कोई बोलकर — सब चकित रह जाते हैं, पर पूर्ण ज्ञान किसी को नहीं होता। यह श्लोक अहंकार को तोड़ता है — आत्मा को जानना सहज नहीं, यह एक अद्भुत रहस्य है जिसे विनम्रता से ही समझा जा सकता है।

आज के जीवन में: आत्मा के विषय में जितना जानें, उतनी विनम्रता बढ़े — क्योंकि यह ज्ञान जितना गहरा है, उतना ही अगम्य भी है।


श्लोक 2.30

वक्ता: श्रीकृष्ण

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥2.30॥

dehī nityam avadhyo ’yaṁ dehe sarvasya bhārata / tasmāt sarvāṇi bhūtāni na tvaṁ śhochitum arhasi

हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी अर्जुन! सभी के शरीर में रहने वाली यह आत्मा सदा अवध्य — अर्थात् कभी न मारी जाने वाली — है। इसलिए किसी भी प्राणी के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

भावार्थ: 'अवध्यः' अर्थात् जिसे कोई मार न सके। श्रीकृष्ण इस पूरे खंड का सार एक वाक्य में देते हैं — हर शरीर में जो आत्मा है, वह सदा अमर है। चाहे भीष्म हों, द्रोण हों या कोई भी — उनके भीतर की आत्मा अविनाशी है। इसलिए 'मैं इन्हें मार दूँगा' — यह भाव ही भ्रम है। यह उपदेश अर्जुन के शोक और मोह दोनों का समाधान करता है।

आज के जीवन में: हर प्राणी में अविनाशी आत्मा को देखने की दृष्टि मिले, तो न किसी से घृणा होगी, न किसी के लिए अनुचित शोक।


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